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आख़िर

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आख़िर
आख़िर

मैं क्यों इस क़दर प्यार करूं
मैं क्यों इस क़दर तुझपे मरूं
देना तुझे अगर गम ही है तो,
मैं क्यों इस क़दर तेरा इंतज़ार करूं

सदियाँ बीत गयी है तेरी पुकार सुने
तेरी आने की कोई भी आहट नही है
अश्रु नयन मे भर आए मेरे
मैं क्यों तुझसे वफादार रहूँ

तेरा मेरा साथ ये ज़माने ने भी देखा है
मेरे हाथो मे तेरी प्यार की रेखा है
पास होके भी दूर का ये रिश्ता है
तुझे अपनी साँसों मे पनाह दूं

मेरी मौत पे तो यकीन होगा तुझे
थोड़ी तो तुझे भी मेरी याद सताएगी
मेरी रूह की आवाज़ तुझ तक भी जाएगी
मैं क्यों ना तुझपर ऐतबार करूँ

मान लिया सारा ज़माना झूठा और तू सच्चा है
कही ना कही मेरे लिए तू अभी भी अच्छा है
यकीन क्यों नही फिर मुझे तुझ पर आता है,
मैं क्यों तुझे हमेशा खोने से डरूँ

तू बदल गया है तो मेरे जीने का क्या अर्थ है
साँसें भी खाली-खाली और जीवन जैसे व्यर्थ है
तू है ही नही जीवन मे तो मैं क्यों तुझको चुनु..
घरवालों से भी लड़ बैठा था तेरे लिए
तेरी साँसों के बदले अपनी ज़िंदगी का दावा किया था..
तू तो गद्दार निकला पीठ मे छुरा घोंप दिया
सोचता हूँ आख़िर मैं क्यों अपने घरवालों की ना सुनूँ

~अभिषेक जुयाल ‘पण्डित’