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बेमज़ा

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बेमज़ा
बेमज़ा

बेमज़ा हुआ तो बानगी भी देखों
अब क्यों रास्तों से दिल उखड़ा हुआ है

रत्तीभर न हुआ मुझे इल्म उसका
दीदार में झरोखा भी टूटा हुआ है

बाँछे खिली जब आसमाँ पलकों के ऊपर देखा
मगर अब याद का रहम भी पूरा हुआ है

आमने – सामने बहुत सी रातें गिरी रूककर
बरबस अब कौन सा भरम टुटा हुआ है

खेलती रही मदमस्त बियाबां’मंजिले
क्या हुआ जो एक रास्ता छूटा हुआ है

चारदीवारी छोड़े कई ज़माने बीत गए
अब आजादी से अपना रिश्ता जुड़ा हुआ है

बेमज़ा: नीरस, फीका
बानगी: नमूना, सैंपुल
बियाबां: जंगल, वन