Home साहित्य बिखरे पन्ने… भाग -2

बिखरे पन्ने… भाग -2

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बिखरे पन्ने... भाग -2

दुनिया से लड़ता हूँ लेकिन, खुद के दिल को कैसे मनाऊं
बेगानी रूखी रातों में, साँसों को कैसे भरमाऊं
बहरहाल कोई सिरा जो मेरे घर से गुज़रता था
उसके रास्ते कितनी मुश्किल से बने हैं
फिर भी कहानी लिखने को बस बिखरे पन्ने हैं

दबी हुई कितनी आवाज़ें, खामोशी का जाल बिछाएँ
झूठी मुस्कानो से कितनी जल्दी अपना हाल छुपाएं
मेरी दलीलें मुस्तरद* हो गयी जो उनसे लगातार की थी
तू अपने वजूद को पोशीदा* क्यूँकर रखा है तुमने
ज़ाहिर होने के अब तो तमाम तरीकें हैं
वो बात अलग है कि पास अब सिर्फ बिखरे पन्ने हैं

इतना ही कहना है यारों, हर पल मे खुशियों को ढूंढो
मिलता है गर तुमको गम भी, संग उसके तुम जमकर झूमो
माना कि मेरा तसव्वुर* तुमसे मुख्तलिफ* है
फिर भी मैं अपनी आधी-कच्ची ज़ीस्त* से मुतमईन* हूँ
हाँ शायद मेरे कुछ ख्यालात मुझसे ही अनमने हैं
अपनी किस्मत में सिर्फ कुछ बिखरे पन्ने हैं

कठिन शब्द और उनके अर्थ:
पोशीदा– छिपा या छिपाया हुआ, गुप्त, अदृश्य, ढका या ढाँका हुआ
तसव्वुर– कल्पना
मुस्तरद– ख़ारिज किया हुआ, अस्वीकृत
मुख्तलिफ– अनेक प्रकार का, विभिन्न, अलग अलग
ज़ीस्त– ज़िन्दगी
मुतमइन– संतुष्ट

 
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