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छोटे शहरों, गाँवो और कस्बों से आए हुए लोग

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sushant singh
छोटे शहरों, गाँवो और कस्बों से आए हुए लोग

छोटे शहरों, गाँवो और कस्बों से आए हुए लोग… न जाने कितने अरमानो का भारी बोझ लिए मुंबई, दिल्ली, कलकत्ता, बैंगलोर जैसे बड़े शहरों में जाते हैं। आखिर किस अधिकार से आते हैं ये लोग, क्या इन्हे नहीं पता कि यहाँ पर कितने ज़हरीले सांप, मगरमच्छ, झूठी दबंगई, मक्कार, स्वार्थी और लालच से भरे रसूख वाले लोग रहते हैं, जिनको इनका आना बिलकुल भी पसंद नहीं है। अरे भैया तुम क्यों अपना कमर तुड़वाने, जूते घिसने और भूख के लिए भी संघर्ष करने आते हो इन बड़े शहरों में। क्या तुम्हे नहीं पता कि यहाँ के तथाकथित अमन पसंद, ऐशो आराम, निजता के पैरोकार लोग तुम्हारे आने से बौखला जाएंगे। अरे भैया उनकी गद्दी खतरे में पड़ रही हैं… क्योंकि सालों से उनके मुताबिक ही काम हो रहा है, कभी वो अपने अभिजात्य वर्ग की धौंस जताते हुए तुम्हे अपनी औकात का एहसास करवाएंगे, कभी तुम्हारे कपड़े, तुम्हारा रहन-सहन, तुम्हारे तरीके, तुम्हारे पुराने और उबाऊ संस्कार (उनकी नज़रों में), तुम्हारी सत्यता, तुम्हारे भोलेपन और तुम्हारी आस्तिक और धार्मिक प्रवृति पर तंज कसेंगे।

तुम छोटे शहरों, गांवों और कस्बों के लोग क्यों आ जाते हो इनकी साख में पलीता लगाने। तुम्हे पता नहीं ये किस खानदान के हैं?? ये उन खानदानो से हैं जिन्होंने अंग्रेजों से ग़ुलामी करवाना, अपनी भारतीय संस्कृति का मज़ाक उड़ाना, अपने आपको एलिट कहलवाने के लिए बड़े बड़े विदेशी आकाओं के तलवे चाटना सीखा है। तुम तो शुद्ध देसी माटी के लाल, इनके कमरों के रूम फ्रेशनर में तुम्हारी गोधूलि की कोई कीमत नहीं है, ये तुम्हे अपने कुत्तों से भी गया गुज़रा समझते हैं और जब तुम अपने संघर्ष, परिश्रम, प्रतिभा से इनसे भी ऊपर पहुंच जाते हो, इनकी बराबरी करने लगते हो, तो इनकी चूलें हिलने लग जाती है। तुम इनकी आँखों को अखरने लगते हो जब ये तुमसे पार नहीं पा पाते तो तुम्हे अपनी तरह बनाए रखने का प्रयत्न करते हैं। और मजबूरी और सर्वाइवल की वजह से तुम भी इनकी जीवन शैली को अपनाने लगते हो जब तक तुम इनकी बात मानते हो तब तक इन्हे अपने झूठे सम्मान पर बड़ा अभिमान होता है, लेकिन जब तुम अपना स्वयं का रास्ता चुनने लगते हो, अपनी अंतरात्मा की ध्वनि को सुनकर सारी गलत कार्यों को तिलांजलि देने लगते हो, तो इनको अपनी पराजय दिखने लगती है। इन्हे लगता है अरे ये मेरी बात को कैसे काट सकता है सुशांत सिंह राजपूत तुम जहाँ भी हो, इस निर्दयी और पाप की दुनिया से तो अच्छी जगह होगी वो। कम समय में ही तुमने इन छद्म बॉलीवुड (जो हॉलीवुड के नाम की नक़ल है ,इनका खुद का कोई अस्तित्व नहीं ) के तथाकथित कलाकारों के वर्चस्व को चुनौती दे दी थी , तुम उगते हुए सूर्य के समान चमक रहे थे और आगे बढ़ रहे थे, मगर इन्होने तुम्हारी जीवन ज्योति को सदा के लिए बुझा दिया।

और गटर बॉलीवुड के नकली नायको को लोग सचमुच का नायक मानने लगे, आदर्श मानने लगे। पर गलती इन नकली नायकों की कम और हम लोगों की ज़्यादा है। हम लोगों ने इनको भगवान् के समक्ष मान लिया, ये तो देखा ही नहीं कि मुस्कुराते, हँसते, रुलाते और अभिनय करने वाले चेहरे के पीछे एक घाघ छुपा है…, जिसे सिर्फ अपना कल्याण करना है। लोग जाएं भाड़ में, लोग इनकी 500 -600 -1000 रुपये खर्च करें, इन्हे आँखों पर बिठायें और ये कुकर्म करते रहें। ये लोग हमारे सम्मान के लायक नहीं है, हालाँकि मैं ये भी नहीं कहूंगा कि सभी यहाँ पर ख़राब है, इनमे हैं कुछ अच्छे लोग, जिन्होंने अपना ज़मीर और अपनी सच्चाई को कायम रखा है और अपने सिद्धांतों से किसी भी प्रकार से विमुख नहीं हुए। मगर ऐसे सज्जन लोगों फिल्म और टीवी उद्योग में बहुत कम है।

कोई रसूखदार तथकथित सुपरस्टार शराब के नशे में गाडी चलाकर फुटपाथ पर सोये हुए गरीब लोगों को कुचल देता है और उनमे से एक की हत्या भी होती है। मगर अपने कुकर्मो छुपाने के लिए चैरिटी करने का नाटक करते हैं और उसको धंधा बना देते हैं ऐसा नहीं कि इनकी चैरिटी से किसी का भला भी हुआ होगा.. ठीक है, इन्होने चैरिटी भी की, अच्छी बात है, मगर इस से पाप तो नहीं धुलेंगे न! अगर इतना ही दबंग बनते हो तो न्यायलय में जाकर सच सच अपनी करतूत बता दो कि कैसे तुमने उन निहत्थे, लचर, गरीब फुटपाथ पर सोने वाले मज़दूरों पर अपनी गाड़ी चढ़ा दी और एक की मृत्यु के कारण तुम हो कैसे तुमने विलुप प्रजाति के हिरन के शिकार किया और फिर अपने झूठ के दम पर न्यायालय को धत्ता बता दिया। यहाँ यह कहने की ज़रुरत नहीं कि तुम दरिंदों से कम नहीं हो। तुम्हारा नाम लेना भी अब शर्म का विषय है, मगर जैसे कि हमारी प्रवृति है हम न तुमसे डरते हैं, न तुम्हे कुछ मानते हैं इसलिए सलमान खान तुम्हे पता है तुमने क्या क्या कुकर्म किये हो और झूठी दबंगई से कितने ही कलाकारों का करियर तबाह किया है, ये फिल्म उद्योग न तुम्हारी, न करण जोहर की, न आदित्य चोपड़ा की, न उस भौंडी और अश्लील एकता कपूर बपौती है। ये उद्योग लाखों मेहनती कलाकारों और उनसे सम्बंधित कर्मचारियों के दम पर चल रही है। तुम जैसे निकृष्टतम व्यक्ति जब इन फिल्मों की दुनिया की देन हो तो , हमें नहीं बनना तुम्हारी तरह। एक और हैं बाबा कहलाने वाले नशे में धुत्त रहने वाले और एक समय पर ड्रग्स में डूबे रहने वाले संजय दत्त, जो नशेड़ी आदत, संवाद अदायगी, और बड़े बड़े डॉन का किरदार निभाने के लिए महशूर हैं। ये जनाब 1993 के बम ब्लास्ट में मुख्य आरोपियों में से एक थे। वो तो पता नहीं इन्होने क्या तिकड़म लगाई कि सिर्फ आर्म्स एक्ट लगा वरना इनपर पर तो टाडा या पोटा एक्ट लगना चाहिए था। खैर किस्मत अच्छी है और हमारे देश की जनता बहुत जल्दी भूल जाती है कि ये एक सजायफ्ता मुजरिम है जिसने मुंबई के आतंवादी हमले मे अप्रत्यक्ष रूप में अपनी भागीदारी की थी उसके जीवन पर बनी हुई वो सड़ी हुई फिल्म जिसमे उसे पीड़ित दिखाया गया , विक्टिम कार्ड बड़े अच्छे से खेला इस मक्कार अभिनेता ने। महिलाओं के प्रति इसका क्या नजरिया है, हमने देख लिया था जब इसकी फिल्म को यह करके प्रचारित किया जाता है कि इस शख़्स की 350 महिलाओं साथी रह चुकी है, थू है ऐसे मानसिकता पर।

ये गटर बॉलीवुड वाले हमें जितना ज्ञान देते हैं जैसे साम्प्रदायिक पर ज्ञान, अच्छे संस्कारों पर ज्ञान, मगर जब इनको उस ज्ञान पर अमल करने के लिए कहा जाता है, तो इनके रीढ़ की हड्डी गायब हो जाती है। ये बस जूतों के पैंतावे पर अपनी जीभ रख कर और शराब जिसे मैं अक्सर गधे का मूत्र कहता हूँ… उसे पीते हैं। टीवी और फिल्मों में तो बड़े बड़े संस्कारों की बात करते हैं और फ़िल्मी पार्टियों में इनके संस्कार धुंए के छल्लों, शराब की बूंदों , नग्नता का प्रदर्शन, और अश्लीलता के बादलों में उड़ जाते हैं। अब सुनो, अपने आपको भगवान और मसीहा मानने वाले कुकर्मियों, हमें तुम लोगों की कोई आवश्यकता नहीं। तुम लोग ही नहीं, राजनीतिक रसूख रखने वाले वोटों के भिखारी राजनैतिक दलों के लोगों, क्रिकेट और भी बहुत से क्षेत्रों के झंडा बुलंद करने वाले छद्म बुद्धिजीवी, जिन्हे मैं अक्सर कुबुद्धि निर्जीव कहता हूँ, ने अपने दुराचार के कारण अपनी खुद की इज्जत का भट्टा बिठा दिया। क्योंकि न तो इनके अंदर बुद्धि है और न ही ये लोग ज़िंदा हैं, इनकी इंसानियत और इनका ज़मीर धंस चुका, सड़ चुका, मर चुका है।

और रही बात छोटे शहरों के आशावान, प्रतिभाशाली और मेहनतकश लोगों की जो अपने पलकों की झालरों, अपनी दिल की धड़कनों, अपनी जीवन की सांसों में जो ख्वाहिशों का संसार बना रखा है, उसको सच करने के लिए और अपने बुद्धि, बाहुबल और प्रतिभा के बल पर आएंगे और तुम्हारे समक्ष खड़े रहेंगे। अगर तुम ह्रदय से अच्छे बनोगे तो तुम्हे अपना आदर्श अपना सहोदर मानेंगे…मगर अगर अपनी गद्दी को बचाने के चक्कर में इन प्रतिभाओं का दमन और शोषण करोगे, तो लाखों अर्जुन और श्री कृष्ण अब आ चुके हैं तुम्हारे पापों का सर काटने के लिए। क्योंकि तुमने हमारे अभिमन्यु सुशांत को निहत्था करके मारा है। हम तुम्हे तुम्हारी हैसियत दिखाएंगे और तुम्हारे रसूख को ज़मींदोज़ कर देंगे। हम छोटे शहरों के लोग हैं मगर हमारे निश्चय, हमारा संघर्ष और हमारी लगन समुद्र के समान बड़ी गहरी और विस्तृत है। दूसरी बात ये है कि यहाँ हमारा मुकाबला उन लोगों से नहीं जो धनवान हैं मगर ईमानदार और दूसरों का दर्द समझने वाले हैं, यहाँ हमारा विरोध उस सामंतवादी मानसिकता है जो अपने से परे किसी को कुछ नहीं समझते हैं…तो छोटे शहर हों या बड़े शहर के ईमानदार प्रतिभाशाली लोग, ये उन अभिजात्य वर्ग (elite class) के लोगों में शामिल नहीं जो अंग्रेजी के बड़े बड़े व्याख्यान, अंग्रेजी लिट्रेचर पाश्चात्य सभ्यता का पिछलग्गू बनकर अपने आपको कथित बुद्धिजीवी प्रचारित करते हैं, ये उनकी तरह भी मौकापरस्त नहीं है जो अपने देश के सभी संसाधनों का उपभोग करते हैं मगर उनकी जुबान में अपने देश के लिए सिर्फ आलोचना, घृणा और कुंठा है। बल्कि ये छोटे शहरों से निकले हुए वो बांके रणवीर है जो अपनी ज़मीन और जड़ों के सम्मुख रहते हैं उसकी परेशानी और मर्म को समझते हैं, इन्हीं खांटी मनुजों ने है भारत में व्याप्त विषमताएं, कुरीतियां, अपराध, अच्छा बुरा , सांस्कृतिक विरासत, राष्ट्रभक्ति और सभी पहलू जो आम जनमानस को कुरेदती हैं और एक प्रश्नचिन्ह छोड़ जाती हैं, उनको उजागर किया है ताकि एक समझदार और ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते सभी ना केवल अपने अधिकारों के प्रति सचेत रहें बल्कि अपने कर्तव्यों का निर्वहन भी बिना किसी स्वार्थ और अपेक्षा के अनवरत करते रहें, धन्य हैं ऐसे माटी के लाल।

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