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दिलासा क्या दूँ दिल को

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Man standing with open arms
दिलासा क्या दूँ दिल को

दिलासा क्या दूँ दिल को, ये भटक रहा है
किसी और की सरपरस्ती में उछल रहा है

जानता हूँ मैं ये कि गलत राह पर हूँ
फिर भी राह से दिल भटक रहा है

औज़ार कुछ नहीं बस उसकी आँखें है
और सीना मेरा दर्द से छलक रहा है

ज़ोर आज़माइश बहुत की है मैंने
मगर ये सफर बड़ा कम्बख्त रहा है

एक निगाह भर देख लूँ उसको तो बात हो
यही कुछ आजकल अपना शगल रहा है

छोडो यार कि ये सबकुछ बेमानी है
अपना ठिकाना तो बस घर रहा है

वो जो साथ है वही अपना है उम्र भर
बाकी ज़िक्र तो बस खलल रहा है

मेरी ज़िद मेरे लफ़्ज़ों का बयां है
और उसमे इरादों का दखल रहा है

कहानी, नग्मे, किताबें और किस्से
अपनी ज़िन्दगी का हिस्सा बदल रहा है