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किसान आन्दोलन के आड़ में विपक्ष का प्रोपेगैंडा

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Farmers protest
किसान आन्दोलन के आड़ में विपक्ष का प्रोपेगैंडा

सरकार की तरफ से किसानों को लिखित गारंटी देने का भरोसा दिया गया है कि MSP यानि न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था बनी रहेगी और इसमें किसी तरह का बदलाव नहीं होगा, मगर उसके बाद भी किसान समझना नहीं चाहते और पता नहीं किस बहकावे में आ रहे हैं।

कांग्रेस और गद्दार विरोधी दलों को इस आन्दोलन ने संजीवनी दे दी है। किसान कांग्रेस और विपक्ष के हाथो में आसानी से खेल रहे हैं। छद्म बुद्धिजीवी, वामपंथी विचारधारा के झंडाबरदार, अलगाववादी संगठन और पाकिस्तान परस्त सेकुलर मीडिया के लिए अब ये एक सुनहरा मौका है कि देश को किस तरह से बदनाम किया जाए। पता नहीं किसानों को क्यों समझ नहीं आ रहा है। जो इतने सालों से सेक्युलर पत्रकार और विरोधी षड्यंत्र कर रहे थे कि देश को और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को नुकसान पहुंचाया जाए, उनकी छवि पर दाग लगाया जाए। कई बार उन्होंने प्रयास किया कभी अवॉर्ड वापसी गैंग ने मोर्चा संभाला, कभी भारत की बर्बादी के नारे लगाने वाले विखंडित गिरोह ने तमाशा दिखाया। कभी विपक्ष ने डर का माहौल बनाकर सेक्युलरवाद के लिए खतरा, संविधान के लिए खतरा बताकर इसका प्रोपेगैंडा चलाना चाहा। कभी जीएसटी और नोटबंदी को विफल बताकर लोगों में भ्रांतियां फैलाई। जाट आरक्षण के नाम पर पूरे देश को जान माल की हानि करवाई। मुसलमान खतरे में कहकर बहकाया, इस्लामिक कट्टरवाद पर चुप्पी और हिन्दुओं को जबरन फसाने का हमेशा से विरोधियों की चाल रही है। वो तो देश अधिकतर लोग समझ चुके हैं इनकी गंदी मानसिकता को तभी इन कांग्रेसी दलालों के झांसे में नहीं आते। अभी तक वो सफल नहीं हुए थे, मगर किसान आन्दोलन का हाल जिस तरह से देख रहा हूं, कुछ हद तक उन्होहने देश को बर्बादी की कगार पर लाने को मजबूर कर दिया है। कांग्रेस वामपंथी और सेक्युलर मीडिया का गठजोड़ भारत के लिए कैंसर और कोरोना से भी ज्यादा जहरीला और घातक है।

अभी प्रथम दृष्टि में विपक्ष के मंसूबे सफल होते दिख रहे हैं, क्योंकि इस देश में ‘battel of perception’ की लड़ाई जो जीत गया वही लोकतंत्र का सिरमौर होगा। बाकी तो सब चलताऊ है। जीना सभी ने अपने दम पर है पर फिर भी ना जाने सरकार पर इतनी निर्भरता क्यों है। मै यहां ये नहीं कह रहा कि आपको अपनी चुनी हुई सरकार से कोई अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए या उसका विरोध नहीं करना चाहिए या उस से असहमत नहीं होना चाहिए, मगर जब सरकार आपके भ्रम और आपके अज्ञानता को दूर कर रही है और हर प्रकार की आपको गारंटी वो भी लिखित दे रही है तब समझ नहीं आता आप किस खेल में उलझ रहे हैं। जो व्यक्ति अपने लिए अपने मुख्यमंत्री प्रॉविडेंट फंड तक का पैसा नहीं रखता और अपने सपोर्ट स्टाफ को बांट देता है आप उस व्यक्ति मोदी की नीयत पर संदेह कर रहे हो। जो महामानव वोट की राजनीति ना करके जोखिम भरे फैसले लेता है ताकि देश का कल्याण हो, आप उस पर लांछन लगा रहे हैं। समय बताएगा कि कौन कितना समझदार और कौन कितना अभागा है। अभी तो जिस तरह से परिस्थिति नजर आ रही है, किसानों का आन्दोलन अगर अराजक हुआ तो ये क्रूर और हिंसात्मक रूप ले सकता है। तब तो फिर लोकतंत्र की चटनी बन जाएगी और जिस संविधान की आड़ में मंदबुद्धि विपक्ष अपना षड्यंत्र चला रहा है वो मरणासन्न हो ज जाएगा और किसी कूड़े के ढेर में पड़ा हुआ मिलेगा जिसमे ना कोई जिल्द होगी, ना कोई पन्ना। बस होगा तो बेजा इस्तेमाल करने के लिए अपनी राजनीति को चमकाने का लक्ष्य जो कांग्रेस जैसी देशद्रोही और मक्कार पार्टी अच्छे से जानती है।

एक और बात के लिए मैं कांग्रेस और सेक्युलरवादी दलों को तारीफ करूंगा कि कम से कम ये अपने समर्थकों का संज्ञान लेते हैं, और उनकी रक्षा करने के लिए कानून भी तोड़ देते हैं। नहीं तो भाजपा की यही एक कमी है कि वो अपने समर्थकों के लिए उग्र रूप से कदम नहीं उठाती, अर्णब और कंगना रनौत का मुद्दा एक सटीक उदाहरण है। भाजपा से इतना निवेदन है कि अपने कार्यकर्ताओं और अपने समर्थकों के लिए अंगरक्षक बने। जिस तरह एक भाजपा समर्थक को भक्त और अंधभक्त को संज्ञा से नवाजा जाता है मगर उसके बाद भी वह अपनी राजनीतिक विचारधारा , देशभक्ति और निष्ठा से विमुख नहीं होता उसी तरह भाजपा को भी अपने विरोधियों को केवल बातों और चुनावो से नहीं बल्कि डंडों और हिंसा से चुप करवाना होगा क्योंकि ये विपक्ष दलालों का काम करता है और संविधान मानवों के लिए है दानवों के लिए नहीं।

ये अहिंसा और शान्ति को पीपड़ी बजाना छोड़ दो और भगवदगीता का अनुसरण करो। जिसका एक श्लोक हमेशा अधूरा पढ़ा जाता है।
“अहिंसा परमो धर्मः” (यह अधूरा है, पूरा नहीं है)
जबकि पूरा श्लोक इस तरह से है।
“अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च:
(अर्थात् अगर अहिंसा मनुष्य का परम धर्म है तो धर्म की रक्षा के लिए हिंसा करना उस से भी श्रेष्ठ है (उस हिंसा को हिंसा नहीं बल्कि दोषी आप दण्ड देना कहते हैं और न्याय सुनिश्चित करना कहते हैं)। तो हमे इस नीति पर चलना पड़ेगा नहीं तो फिर गांधी के रास्ते पर चलने में एक थप्पड़ के बदले अगर दूसरा गाल भी दिखा दिया तो ये इतने थप्पड़ मारेंगे कि गाल तो छोड़ो पूरा बदन लाल कर देंगे फिर भी इनको संतुष्टि नहीं होगी। तो हाथ उठाने से पहले ही उस हाथ को बाजुओं में से उखाड़ दो ताकि फिर हाथ क्या उंगली उठाने में भी हजार बार सोचें ये अराजक तत्त्व। जय हिन्द जय भारत, वन्दे मातरम्, भारत माता की जय🙏

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