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कविता से संवाद

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कविता से संवाद
कविता से संवाद

बहुत दिनों बाद मिला अपनी कविता से, उससे वार्तालाप हुई तत्पश्चात उसको मन के सूक्ष्म कोनों मे सम्माहित किया उस से हाल-चाल पूछा ,”और कविता कहाँ थी… तुम इतने दिन?”, कविता ने उत्तर दिया,”मैं कहाँ जाती , मैं तो यही थी तुम्हारे विचारों मे, तुम्हारे मनोभावों मे, सोच मे! तुम ही हो जो मुझे इतने दिनों से लिख नहीं रहे हो”,

मैंने कुंठित हृदय से उत्तर दिया,” तो मैं क्या करता, तुम्हे लिखने समय ही नहीं मिलता हालाँकि लिखने के विषयों की भरमार तो हैं , परन्तु मेरा मन आलस्य की निद्रा में रहता है और अब वो सामाजिक सरोकार से जुड़ी हुई रचनाओं का सृजन करने से कतराता है।”,

कविता ने फिर पूछा, ” किंतु ऐसा क्यों, पहले तो ऐसा नहीं था, पहले तो तुम प्रत्येक ज्वलंत मुद्दों और विषयों पर मेरी रचना करते थे, तो अब आख़िर ऐसा क्या हो गया कि तुमने मुझे लिखना बिल्कुल बंद कर दिया।”

मैने प्रत्युत्तर दिया,” देखो स्पष्ट और सरल बात ये कि तुम्हे लिखने कोई लाभ नहीं मिल रहा, और मेरे पास इतना व्यर्थ समय नहीं जो तुम्हे लिखने मे अपनी कलम तोड़ता रहूं। “,

कविता ने क्रोध भरे स्वरों और प्रतिकार स्वरूप कहा,” वाह रे! स्वार्थसिद्धि, भौतिकवादी और बाज़ारवादी मानसिकता के अधीन मानव, तुम्हारी प्रवृति हमेशा धन उपार्जन तक ही सीमित रहती है क्या? फिर वो आदर्शों, वो सिद्धांतों, निष्ठाओं और सत्य की बात करना खोखले खंडरों को खोदने जैसा है क्या ? क्या तुम्हे समाज मे हो रहे बदलाव, दमन, शोषण, क्रांति, आंदोलन, राजनीति, धर्म, अत्याचार, भ्रष्टाचार, कुंठा से कोई सरोकार नहीं, अरे! तुम तो बहुत बड़े अवसरवादी निकले, और दूसरों को बड़ा ज्ञान देते हो, उपदेश देते हो, तुमसे अधिक स्वार्थी और कुंठित कौन होगा।”

फिर मैने कहा” ऐसा नहीं है कविता, मैं तो बहुत चाहता हूँ लिखना, लेकिन विडंबना ये है कि आजकल कोई पढ़ना ही नहीं चाहता और ना ही सुनना चाहता है, सब मनोरंजन की बाँसुरी बजाना चाहते हैं ,कोई भी यथार्थ, तर्कवादी, एकरूपता वाले विषयों पर ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहता। कोई अपनी कल्पना मे कल्पनावादी बनता है, कोई फंतासी और आधुनिकता के फेर मे परंपरागत अवस्थाओं और अवधारणाओं पर कुठाराघात करता है, क्योंकि ऐसा करने मे उन्हे छ्द्म स्वछ्न्दता और स्वयंभू नास्तिकता की अनुभूति प्राप्त होती है| यदि यथार्थ कोई लिखता भी है तो वो इतना अशोभनीय होता है, जिसमे वास्तविकता और प्रयोगधर्मी अवधारणा की आड़ मे निकृष्ट सामग्री का प्रदर्शन, वाचन, संपादन और प्रसारण किया जाता है, तो तुम ही बताओ ऐसे परिस्थिति मे मैं तुम्हारा सृजन कैसे करूँ।”

कविता ने मेरे अज्ञान चक्षुओं को नष्ट करने और कर्तव्यपरायण हृद्य को जागृत करने के उद्देश्य से कहा, ” यदि इस संसार मे अन्याय, अधर्म, पाप, असत्य , कुकर्म, दमन, शोषण और कुछ भी अनुचित होगा तो तुम तटस्थ रहोगे क्या? मूकदर्शक बने रहोगे क्या? और यदि कोई विपरीत स्थिति तुम्हारे परिजनो के साथ होती है तो तब भी तुम्हारा यही आकलन और यही मानसिकता होगी,

वर्तमान मे तो तुम अपनी सुविधा के अनुसार इन प्रचंड मुद्दों से बच सकते हो और एक जोखिम रहित जीवन जी सकते हो, पर क्या आने वाली भावी पीढ़ी के चुभते हुए प्रश्नो का उत्तर देने मे सक्षम हो पाओगे? क्या इतिहास के पन्नों पर अपने नाम के आगे एक नपुंसक और कालिख लगे व्यक्ति की उपाधि स्वीकार है तुम्हे?”

कविता के अति कठोर और कटु सत्य वचनो ने मेरे शरीर, मन, मस्तिष्क और विचारों मे क्रांति का प्रस्फुटन किया और मैने यह निर्णय लिया कि अब कभी भी ज्वलंत मुद्दों से, सामाजिक क्रियाकलापों से और विभिन्न विषयों, जिसमे मानव हित, स्वयम् वेदना, स्त्री विमर्श, सामाजिक चेतना का मनोभाव हो, उनको अपनी रचनाओं मे स्थान दूँगा और कविता को प्रत्येक विषय में गढ़ने को तत्पर रहूंगा

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