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खानसामा

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“माँ खाना दे दो बहुत भूख लगी है” अजित ने अपनी माँ से कहा। “हाँ अभी देती हूँ, पर पहले मुँह हाथ तो धो ले”, माँ ने उत्तर दिया अजित घर में सबसे छोटा है 3 भाई बहनो में जिसमे प्रमोद उसका बड़ा भाई जो रेलवे में स्टेशन मास्टर है और उसकी सरकारी नौकरी है उसके बाद सीमा जो अभी ऍम कॉम फाइनल ईयर में है और उसको इंटीरियर डिजाइनिंग में बहुत दिलचस्पी है और कॉलेज की पढाई पूरी होने के बाद वो वही करना चाहती है। रही बात अजित की तो ग्रेजुएशन कर चुका है कॉमर्स में यानि वो बीकॉम डिग्री धारक है और अभी किसी अच्छी नौकरी की तलाश में है।

वैसे तो हमारे समाज में सिर्फ लड़कियों से ही आशा की जाती है कि उनके घर के कामो में पूरी तरह निपुण होना चाहिए, क्योंकि कल को उन्हें ससुराल जाना है तो कहीं मायके वालों की जगहंसाई न हो। मगर अजित के घर का माहौल काफी अलग था। यहाँ सभी घर के काम करने में निपुण थे, सिर्फ अजित को छोड़कर मगर उसकी माँ और पिताजी उसे कितनी बार समझते बेटा घर के काम आने चाहिए, भले ही तुम्हे करना न पड़े, मगर कई बार जीवन में ऐसी स्थितियां आती है कि हमें वो काम करना पड़ता है, और जब हम उस काम को करना नहीं जानते तो हमें फिर दुःख होता है। फिर हम वही काम किसी दूसरे से करवाते हैं, तो या तो हमें पैसे देने पड़ते हैं, या फिर हमको वो काम पसंद नहीं आता। हालाँकि अजित एक कान से सुनता और दुसरे से निकाल देता था।

जब भी उसे ऐसा बोलते तो कहता ” माँ आप हो तो, और फिर सीमा दीदी भी किसलिए है, और प्रमोद भैया को आता है तो ज़रूरी तो नहीं मुझे भी सब काम आना चाहिए”, ऐसे कुतर्क देकर वो अपने आपको बड़ा तीसमारखाँ समझता था। ” तुम्हे समझाने का मतलब है पहाड़ पर चढ़ना, रहने दो तुम कभी नहीं सुधरने वाले” अजित की माँ ने थक हार कर कहा

ऐसे ही चलता रहा कई सालों तक, इस दौरान अजित ने किसी चार्टर्ड अकाउंटेंट के पास एकाउंटिंग सीख ली थी। पहले तो उसको किराया भाड़ा मिलता था , यही कोई तीन से चार हज़ार तक, फिर जैसे जैसे साल दो साल हुए उसका वेतन ₹15,000 रुपये मासिक हो गया, फिर उसने किस दूसरी कंपनी में आवेदन किया उसको वेतन में अच्छी बढ़ोतरी मिली और उसकी सैलरी ₹20,000 रुपये मासिक हो गयी। इन दो-तीन सालों में प्रमोद और सीमा का भी विवाह हो गया। प्रमोद का स्थनांतरण अब प्रयागराज (पहले इलाहबाद) हो गया था तो वो पत्नी समेत वहां चला गया। सीमा अपने ससुराल में जो दिल्ली के द्वारका में पड़ता है वहां रहती है और इंटीरियर डिज़ाइनर बन चुकी है, संयोग से उसके पति निरंजन काफी सुलझे हुए और सहयोगी हैं, वो हमेशा सीमा प्रोत्साहित करते हैं, जीवन में कुछ अच्छा करने के लिए, यही वजह है कि जब सीमा को देखने जब निरंजन आये थे, सीमा ने उनसे पहले ही पूछ लिया था की मैं शादी के बाद नौकरी या अपना कुछ करना चाहती, हूँ तो आपको ऐतराज तो नहीं, निरंजन पढ़े लिखे और नयी सोच वाले व्यक्ति हैं, तो उन्होंने इस पर ख़ुशी जताते हुए कहा ” सीमा जी ये तो बहुत अच्छी बात है जो आपकी अपनी एक सोच है और आप आत्मनिर्भर बनना चाहती है तो ये तो मेरे गर्व का विषय है, पति पत्नी एक दुसरे का पूरक है, मगर यदि इसके इतर दोनों का अपना एक अस्तित्व है, तो उस से अच्छा क्या हो सकता है

खैर सीमा का जीवन तो अच्छा चल रहा है, मगर अजित की आदत अभी तक नहीं गयी, एक ओर सीमा जो आत्मनिर्भरता की मिसाल है, दूसरी ओर अजित अभी भी अपने काम दूसरों पर टाल देता है। आखिर कब तक ऐसे चलता, वैसे भी अब माँ बाप के साथ अकेला अजित ही तो था, इसलिए अब माँ भी उसे ज्यादा नहीं बोलती थी, आखिर माँ जो ठहरी।

लेकिन समय का बाण जब चलता है तो फिर उसे कोई नहीं रोक सकता। ऐसे परिस्थितियां आई कि अजित का पूरा जीवन ही बदल गया। आइये जानते हैं ऐसा क्या हुआ अजित के साथ

हुआ यूँ कि प्रमोद जब प्रयागराज रहने लगा था तो वहां की हवा उसको रास नहीं आयी, क्योंकि एकदम से दूसरे शहर में अपने आपको ढालना आसान नहीं होता, पहले तो उसने सोचा की कुछ दिन की बात है धीरे धीरे उसका स्वास्थ्य गिरने लगा। डॉक्टर से जांच करने पर पता चला कि प्रमोद काम और घर की अन्य ज़िम्मेदारियों के कारण अवसाद में रहने लगा था, जिसके कारण थाइरोइड, पथरी और उच्च रक्तचाप समबन्धी समस्या उसे होने लगी। डॉक्टर ने सलाह दी कि या तो इनको अपने परिवार के साथ समय बिताने को मिले और या तो ये कुछ दिन आराम करें।

मेडिकल ग्राउंड पर प्रमोद को दो महीने का अवकाश मिला। पत्नी ने उस से कहा भी कि चलो दिल्ली हो आते हैं माँ पापा के पास थोड़ा आपका मन बदल जाएगा, मांगा अवसाद ने ऐसे उसको घेर लिया था कि वो न कहीं जाने को तैयार था न किसी से मिलने को। ऐसे में क्या करें, तो प्रमोद की पत्नी अंजलि ने फ़ोन करके सारी स्थिति अपनी सास और ससुर को बता दी जिस से कि माँ बाप का मन अधीर होने लगा और दोनों प्रयागराज के लिए निकल पड़े।

अब हुआ ये कि अजित रह गया घर में अकेला और ऐसी स्थिति में वो भी क्या कर सकता था, उसका मन भी तो था कि भैया को एक बार देख सके और उसने भाभी से फ़ोन पर बात भी की, मगर ऐसा भी संभव नहीं था कि सभी लोग प्रयागराज चले जाएँ। साथ ही साथ, अभी नयी नौकरी में इतनी जल्दी लम्बी छुट्टी मिलना संभव नहीं हो पाता। चलो माँ पापा चले तो गए मगर अजित के तो जैसे नाक मुँह तक पानी आ गया, सुबह उठने में कभी देर हो जाती, काम तो उसे कुछ आता नहीं था तो फिर, भूखा ऑफिस में जाने लगा, दिन में बाहर से कुछ खा लिया, मगर खाना इतना महंगा कि उतने ही पैसे में घर में 2-3 दिन का राशन आ जाये। मगर आखिर राशन लाये कौन और क्यों लाये, जब कुछ आता ही नही, न खाना बनाना आता है, न कभी अपने लिए चाय बनाई, न कपडे धोये, न बरतन साफ किये न घर की साफ़ सफाई की।

अजित की पूरी दिनचर्या ही खराब हो गयी। अजीत की मौजूदगी में घर जैसे एक कबाड़खाना बन गया हो, कहीं पर जूते, कहीं पर कपडे फैले हुए, कहीं उसकी बेल्ट पड़ी है, कहीं बाजार से मंगाए हुए चौमीन और पिज़्ज़ा के झूठे बर्तन और रैपर, पूरे घर को तो इस लड़के ने डस्टबिन बना दिया, उसने पड़ोस के ही रहने वाले अग्निहोत्री जी से काम वाली के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा” भाई देखो यहाँ कामवाली बाई के तो भाव काफी बढे हुए हैं, कोई खाना बनाता है तो कोई झाड़ू नहीं लगाता, कोई बर्तन मांजता है तो कोई साफ सफाई नहीं करता, और वैसे भी ये महीने के ₹3000 रुपये लेंगी और उसमे भी पूरा काम नहीं होगा तो अगर तुम खर्च कर सकते हो तो देख लो मैं पता करता हूँ एजेंसी से कोई काम वाली उन्होने कहा ” रहने दो अंकल अभी आप रहने दो, जब मुझे ज़रूरत होगी तब मैं आपको बता दूंगा” अजित ने अनमने भाव से कहा

अब वो कैसे काम करे, कैसे मैनेज करे उसे कुछ समझ नहीं आता, रोज़ ऑफिस में लेट आने के लिए डांट पड़ती, अब तो उसे वार्निंग भी मिल गयी थी कि यदि वो ऐसे ही लेट आता रहा तो उसके वेतन में कटौती होगी और यदि यह लम्बे समय तक जारी रहा तो नौकरी पर भी खतरा हो सकता है, क्योंकि कोई भी कंपनी बिना अनुशासन के नहीं चल सकती और अजित के विषय में रोज़ अनुशासन की धज्जियाँ उड़ रही थी

मां को उसने जब अपनी सारी परेशानी बताई तो माँ ने उसे कहा ” बेटा मैंने तुझे कितनी बार कहा था कि सीख ले, घर का काम सीखने से कोई छोटा नहीं हो जाता, पर तूने मेरी एक बात नहीं सुनी, और आज देख तुझे कितनी दिक्कत हो रही है, अब मैं तो उड़कर तेरे पास वहां नहीं आ सकती न एकदम से, क्योंकि यहाँ तेरे भैया को भी देखना है, मुझे तो अभी 1 महीना और लगेगा, क्योंकि अब धीरे धीरे तेरे भाई की सेहत में सुधर हो रहा है , लेकिन तब तो तुझे खुद ही देखना पड़ेगा” माँ से ये बात सुनकर अजित की रही सही उम्मीद भी धूल में मिल गयी , मगर ऐसा कब तक चलेगा। आखिर अजित ने सोच लिया कि कोशिश तो करनी पड़ेगी, परिणाम की बाद में सोचेंगे।

पास की दुकान से चाय, चीनी और दूध ले गया और अब उसने इंटरनेट की मदद से चाय बनाई, पहले पहले तो चीनी दूध और पानी का सही अनुपात में प्रयोग करने में उसे दिक्कत हुई, मगर धीरे धीरे उसे चाय बनानी आ गयी

इसी तरह उसने धीरे धीरे खाना बनाने का प्रयत्न किया, पहने 4-5 दिन तो जैसा कच्चा पक्का बना उसने खाया, मगर फिर धीरे धीरे उसमे भी उसने महारत हासिल कर ली। इस सबमे बहुत से कूकरी शो, रेसिपी बुक्स और इंटरनेट ने उसकी काफी मदद की। बाकी झाड़ू, बर्तन करने में तो उसे कोई परेशानी नहीं हुई, क्योंकि इसमें कोई विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती , और कपडे धोना भी उसने सीख लिया, वैसे भी मरता क्या नहीं करता, आखिर करना तो उसे ही था। सारे काम अकेले करना और ऑफिस भी जाना, इन सब में पहले पहले उसे बहुत थकान महसूस होती थी, मगर अब उसे ये सब करने में मज़ा आने लगा, और साथ में ये ख़ुशी होने लगी वो भी आत्म निर्भर बन गया है

एक दिन वो घर से मटर पनीर बनाकर ऑफिस ले गया और जब उसने अपना टिफ़िन बॉक्स खोला, तो उसके सहकर्मी ने कहा कि भाई ऑनलाइन आर्डर खाना किया है क्या, तो उसने कहा “अरे नहीं भाई खुद बनाया”, सभी ने जब पनीर की सब्ज़ी खाई, तो सब उँगलियाँ चाटते रह गए। अब तो अजित नए नए व्यंजन बनाकर लाने लगा और थोड़ा ज्यादा भी लाने लगा। अजित के ऑफिस में कई दोस्त और सहकर्मी थे जो घर से बाहर रहने के कारण रोज़ घर का खाने के लिए तरस जाते थे, अजित के व्यंजनों के कारण उनको थोड़ा बहुत स्वाद मिल ही जाता था, मगर पेट कहां भरता था। एक दिन 5 दोस्तों ने अजित से इस बारे में चर्चा की और कहा कि यार भाई तू कर कैसे लेता है, हम तो नहीं कर पाते। परिस्तिथियाँ और आवश्यकतायें व्यक्ति से सब करवा लेती है ” अजित ने जवाब दिया। दो महीने हो गए और प्रमोद अब पूरी तरह से ठीक हो चुका था, उसका पथरी का ऑपरेशन सही रहा, और अब वो खुश रहने लगा, और खाने के परहेज के साथ साथ डॉक्टर ने उसे हल्का फुल्का व्यायाम और सुबह घूमने की सलाह भी दी। माँ और पिताजी अब घर की ओर निकलने के लिए तैयार हो गए, प्रमोद ने माँ पिता से वादा किया कि साल या 6 महीने के अंदर हफ्ते 10 दिन के लिए दिल्ली जरूर आएंगे साथ में रहने के लिए। बहु अंजलि ने रोती हुई आँखों से माँ बाप समान सास और ससुर को विदा किया

घर पहुंचते ही गायत्री देवी (अजित की माँ) और शम्भू शेखर तिवारी जी (अजित के पिताजी) को तो विश्वास ही नहीं हुआ, एक नालायक, आलसी लड़का जो कभी बिस्तर से बिना उठाये नहीं उठा था आज वो सुबह सुबह जल्दी उठ कर घर के सभी काम करके ऑफिस जाता है और घर को उसने शीशे की तरह साफ और निर्मल बना दिया है। माँ बाप दोनों को बहुत ख़ुशी और संतुष्टि हुई और उन्होंने अजित काफी आशीर्वाद और प्यार दिया। आखिर दें भी क्यों नहीं लड़का ज़िम्मेदार जो हो गया था, और जब उसने अपने हाथों से माँ पापा को चाय और अपने हाथ के बने हुए खाने का स्वाद दिया , तो मां ने खुश होकर कहा , “बेटा तूने तो अंजलि (अजित की भाभी) और सीमा को भी पीछे छोड़ दिया। जब तेरी शादी होगी न तो तेरी होने वाली बीवी तुझसे काफी खुश रहेगी” क्या माँ आप भी कैसी बात करते हो मुझे नहीं करनी अभी शादी, अभी तो मेरे खेलने कूदने के दिन हैं, चलो माँ मुझे ऑफिस जाना है, और मैं नहीं चाहता कि मैं ऑफिस में देर से पहुँचू क्योंकि बड़ी मुश्किल से टाइम टेबल ठीक किया है। बेटे का ज़िम्मेदार और सकारात्मक रुप देख कर माँ के आँखों से प्रसन्नता और संतोष की दो – चार बूँदें टपक पड़ी और उन बूंदों में गर्व का अंश भी था।

अजित के स्वादिष्ट खाने से अचानक से समीर, पंकज , ललित, अभिषेक और कपिल जो कि अजित के सहकर्मी और दोस्त हैं, उनको एक क्रांतिकारी विचार आया और उन्होंने फिर अजित से कहा कि क्यों न हम सब मिलकर टिफिन सर्विस शुरू करें और इसमें सबका योगदान रहेगा, सिर्फ अजित का ही नहीं। अजित को ये विचार पसंद आया और सबने मिलकर काम करना शुरू कर दिया, आस पास के ऑफिस में उन सबने अपनी टिफ़िन सर्विस के पैम्फलेट बांटे। शुरू के दो- तीन महीने में ज्यादा कुछ सफलता नहीं मिली, मगर धीरे धीरे घर के खाने का स्वाद फैलता गया, और अजित और उसकी टीम ने आस पास के काम से काम 25-30 ऑफिस में टिफ़िन सर्विस देने का काम पकड़ लिया जिस से उनका बिज़नेस ठीक होने लगा। इसी बीच टीवी पर एक खाना बनाने का शो “दुनिया का एक्सपर्ट शेफ” शुरू हुआ इसमें कई देशों से आये हुए शेफ ने हिस्सा लिया, सभी दोस्तों और घरवालों ने अजित से उस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए कहा, यहाँ तक की उसके ऑफिस वालों ने भी उसे अनुमति दी कि वो इस टीवी शो में हिस्सा ले सकता है। ये पूरा शो 3 महीने तक चला, अजित के साथ साथ भारत के और शेफ ने भी इस शो में हिस्सा लिया मगर अजित उन सबको पछाड़कर देश का प्रतिनिधत्व करने वाले अकेले भारतीय बचे थे। अजित ने काफी मेहनत की और उसको दर्शको और देश भर से दुनिया भर से काफी प्यार मिला, मगर इसके बावजूद भी अजित विजेता नहीं बन पाया , लेकिन अच्छी बात ये हुई कि वो पहला उपविजेता बना। माँ बाप, भाई बहन ने उसे कहा, हमें तुम पर गर्व है , तुम विजेता या उपविजेता इस से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता , हमें इस बात की ख़ुशी है कि आज तुम्हारी वजह से न केवल हमारे परिवार का नाम ऊंचा हो गया बल्कि तुमने अपने देश का नाम भी ऊंचा कर दिया और अजित को भी विजेता न बनने का कोई अफ़सोस नहीं हुआ, क्योंकि जो प्रसिद्धि , अपनापन,गर्व और अपने प्रति प्यार वो परिवार और पूरे देश में वो देखना चाहता था, वो उसे मिल गया था। स्वदेश लौटकर सबसे पहले उसने अपनी मौजूदा एकाउंटिंग की नौकरी से इस्तीफ़ा दिया, और उसकी कंपनी ने उसके इस्तीफे को सहर्ष स्वीकार कर लिया, बल्कि उसकी कंपनी के मालिक ने उसको मज़ाक में ये भी कहा, भाई तुमको उस प्रतियोगिता में भेजकर हमारा तो घाटा हो गया, एक अच्छा एम्प्लोयी हमने खो दिया, मगर हमें ख़ुशी है, कि तुमने अपना रास्ता खुद बना दिया, हम तुम्हारे सुनहरे भविष्य की कामना करते हैं। आमतौर पर कोई भी कंपनी नहीं चाहेगी कि उसका कोई अच्छा कर्मचारी जॉब छोड़कर जाये, मगर यहाँ, अजित ने ऐसा आभामंडल बना दिया था और ऐसी असाधारण परिस्थितियों को जन्म दिया कि कोई चाहकर भी उसे रोक नहीं सकता था और वो किसी के कहने पर रुकने वाला भी नहीं था, क्योंकि सफलता की शुरआत तो अब हो चुकी थी

इसके परिणाम स्वरुप उसका बिज़नेस 10 गुना बढ़ गया और आज वो देश के बेहतरीन शेफ में गिना जाता है, उसको विदेशों से और देश के कई रेस्टुरेंट से जॉब के ऑफर आये, मगर उसने स्वीकार नहीं किया और आज उसके अपने खुद के रेस्त्रां और फ़ूड आउटलेट हैं।

अजित की कहनी से कुछ बातें सीखने को मिलती है कि कैसा हम लोग आलस, लापरवाही और दूसरों पर निर्भर रहने के कारण अपना ही नुक्सान करते हैं। दूसरी बात ये है कि हममें से अधिकतर लोगों की ये धारणा है कि हम घर में होने वाले कामों को काफी आसान समझ लेते हैं जो वास्तव में है नहीं। इस मानसिकता को बदलना होगा कि अगर कोई पुरुष घर का काम करता है, तो इसमें किसी भी तरह की शर्म या मज़ाक उड़ाने वाली बात नहीं है, बल्कि यदि कोई पुरुष अपने घर में होने वाले कामों में निपुण है और अपनी माता, बहन, बीवी का काम में हाथ बंटाता है तो ये तो बहुत अच्छी बात है। तो इस तरह की सोच हम लोगों को मिटानी पड़ेगी और समाज धीरे धीरे बदल रहा है और समाज बदले या न बदले हम लोगों को तो बदलना होगा और दकियानूसी सोच का त्याग करना होगा

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