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किरायेदार

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शारिक कुरैशी बड़ा ही लालची, बद्तमीज और जलनखोर आदमी है। पिताजी उसके पंचर लगाते थे और उसकी कबाडी की पुश्तैनी दुकान थी। जालसाज़ी उसने अपने खानदान से सीखी थी और एहसान फरामोश तो उसके जैसा कोई नहीं था। मक्कारी और धोखेबाज़ी करते हुए उसने अपने लिए बदायूं में बहुत बड़ी धन संपत्ति अर्जित कर दी थी। तब उसके किसी रिश्तेदार ने उसे प्रॉपर्टी में इन्वेस्ट करने के लिए कहा।

नोएडा में उसका बहनोई जमाल सिद्दिक्की रहता था और वो वहां किसी विश्वविद्यालय में जमादार था। जब शारिक ने जमाल से व्यापार के सिलसिले में बात की तो उसने सुझाव दिया कि नोएडा में बहुत कॉलेज हैं और बहुत से विद्यार्थी दूसरे शहरों से यहाँ पढाई करने आते हैं, और उनमे कई विद्यार्थी हॉस्टल की भरकम फीस को देने में असमर्थ हैं इसलिए रहने के लिए वो पेइंग गेस्ट या फिर किराये पर कमरा ढूंढते हैं तो शारिक ने तय किया कि वो यहाँ पर ज़मीन लेकर उसमे एक बहुत बड़ा हॉस्टल के जैसे आवास बनाएगा ताकि विद्यार्थी वहां किराये पर रहें और फिर इस उसको कमाई हो। विचार बुरा नहीं था, वैसे भी पैसे कमाने की होड़ के कारण शारिक ने कितने कुकर्म किये ज़िन्दगी में। शारिक के बारे उसके सताए हुए लोग ये तक कह देते थे कि ये तो समय आने पर अपनी बहन बेटी को बेच देगा।

ज़मीन पर कब्ज़ा करना शारिक की बहुत बुरी आदत थी। पहले गरीबों को क़र्ज़ देना उसके बाद क़र्ज़ न चुकाने की एवज में उनकी ज़मीन हथियाना। इस तरह उसने नोएडा के कर्ज़दार की ज़मीन पर कब्जा कर लिया। कर्ज़दार ने उसे समझाया की वो ज़मीन उसकी नहीं है क्योंकि सरकार ने बहुत सालों पहले उस ज़मीन को खरीद लिया था और उस ज़मीन पर कोई सरकारी ऑफिस बनना था। मगर शारिक ने उसकी एक नहीं सुनी।

लालची स्वभाव होने के कारण उसे अपने बहनोई के बोली हुई बात याद आयी और उसने उस ज़मीन पर हॉस्टल बनाने की सोची क्योंकि उस ज़मीन के आस-पास काफी कॉलेज थे। उसने हॉस्टल बनाने का काम शुरू किया और उसके बाद लगभग डेढ़ साल के अंदर 200 गज ज़मीन पर एक बहुत ही शानदार आवास तैयार हो गया।

धीरे धीरे उसने अपने हॉस्टल का प्रचार करना शुरू कर दिया और उसके बाद कई कॉलेज के छात्र और दूसरे शहर से नौकरी करने के लिए आने वाले लोगों ने इसमें दिलचस्पी ली और देखते ही देखते पूरा हॉस्टल भर गया। 5 फ्लोर के हॉस्टल में हर फ्लोर पर 20 कमरे थे। खैर शारिक की तो निकल पड़ी, मगर चोर चोरी से भले ही जाए पर हेरा फेरी किये बिना उसकी साँस कैसे चले। पहले पहले किराया कम था, मगर 6 महीने बाद उसने एकदम से किराया बढ़ा दिया ऊपर से इतने नियम और शर्तें जिससे एक अच्छा खासा आदमी परेशान हो जाए।

रात को 9 बजे के बाद लाइट मत जलाओ, बाथरूम ज्यादा प्रयोग मत करो, करोगे तो अतरिक्त पैसे दो, थोड़ा सा भी कहीं सफेदी या हॉस्टल में कहीं मरम्मत का काम हो तो उसके लिए भी किरायेदारों से बोलना, बात बात पर गाली गलोच करना अब उसकी दिनचर्या बन चुकी थी। ऐसा नहीं था कि लोग उस जगह को छोड़ना नहीं चाहते मगर, मगर रेंट एग्रीमेंट में उसने लिखा था यदि कोई 11 महीने से पहले छोड़ता है तो 3 महीने का किराया देना पड़ेगा, इतनी महंगाई में कोई 3 महीने का किराया फालतू में कैसे दे दे।

लेकिन फिर रोज़ रोज़ की फालतू लड़ाई, किरायेदारों पर धौंस जमाना, कब तक कोई सहन करेगा और फिर बार बार ये कहना किरायेदार होअपनी औकात में रहो नहीं तो याद दिला दूंगा| खैर ऊपर वाले के घर में अंधेर कभी नहीं हो सकती, किसी ने शिकायत कर दी कि हॉस्टल सरकारी ज़मीन पर बना है और अवैध है।

दरअसल,उसने कई रिश्वतखोर सरकारी अधिकारियों को काफी पैसा खिला रखा था और हर महीने सबका हिस्सा जाता था,मगर वक़्त की मार बहुत तगड़ी पड़ती है। सरकार ने उसे नोटिस भेजा ज़मीन खालीकर दे नहीं तो बुलडोज़र चलेगा| मगर उसने अनसुना किया और उन रिश्वतखोर सरकारी अधिकारियों के पास गया कि इसका कोई समाधान बताओ।

सबने हाथ खड़े कर दिए, उन्होंने कहा कि भैया हमें अपनी धोती बचानी है, तो हम कुछ नहीं कर सकते,अभी हमारे ऊपर भ्रष्टाचार की वजह से जाँच कमिटी बिठाई गयी है, हम खुद बचने की सोच रहे हैं तो तुम्हे अपनी पड़ी है। शारिक की हालत खराब हो गई, उसको गुस्सा आने लगा सोचा कि इन दुष्टों ने इतना पैसा खाया और आज मुसीबत आई तो साथ छोड़ दिया। उसने गाली गलौज और हाथापाई की मगर उसकी ऐसी पिटाई हुई कि उसको अपने परदादा नज़र आने लगे। खैर अब कुछ नहीं हो सकता था, एक महीने में हॉस्टल टूटना था और अब सभी किरायेदार एक एक करके छोड़ रहे थे और किराया भी नहीं दे रहे थे। क्योंकि सभी को अब हकीकत पता चल गई। देखते ही देखते वो दिन आ गया जब पूरे हॉस्टल पर बुलडोज़र चलना था और उसको ज़मींदोज़ करना था। हालात का मारा और अपने कुकर्मो का सताया शारिक खूब गिड़गिड़ाया मगर प्रशासन के आदेश के आगे उसकी क्या बिसात थी और फिर 5 -6 घंटे में सब कुछ बर्बाद हो गया। शारिक की हालत अब भिखारी से भी बदतर हो गयी थी। मन ही मन सोच रहा था कि इससे अच्छा तो कबाड़ी ही ठीक था। इतना गहरा सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाया और उसको हार्ट अटैक आ गया। हॉस्टल गिरने के टाइम पर कॉलेज के 5-10 छात्र सारी गतिविधि देख रहे थे और सभी के सभी उसके किरायेदार थे।

हार्ट अटैक की स्थिति में सभी छात्रों ने मदद की और उसको नज़दीक के अस्पताल ले गए। छात्रों ने उसके परिवार वालों को फ़ोन कर दिया| खैर 2-3 घंटे के बाद डॉक्टर आया और उसने एक खबर दी जो शायद शारिक की नियति थी। डॉक्टर ने कहा कि हार्ट अटैक इतना जानलेवा था और ऊपर से मरीज़ का इम्युनिटी सिस्टम बहुत वीक था क्योंकि मरीज़ हाई ब्लड प्रेशर से पहले ही ग्रसित था और काफी ऐब और नशा करता था, तो वो सर्वाइव नहीं कर पाया। डॉक्टर साहब ने वही अंग्रेजी के घिसे पिटे शब्द कहे “sorry we tried our best but we couldn’t save him and we are sad to inform you all that, he is no more” (माफ़ कीजिये, हमने बहुत कोशिश की पर उनको बचा नहीं सके, दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि अब वो नहीं रहे)

उनमे से एक छात्र ने उसी समय कहा “डॉक्टर साहब किरायेदार था अपनी औकात भूल गया था, जानता नहीं था कि भगवान सबका असली मालिक है और हम सब किरायेदार। इसका दाना पानी यही तक था, इसलिए भगवान ने इसे बता दिया किरायेदार हो अपनी औकात में रहो“। शारिक अपनी औकात भूल गया था, क्योंकि आखिर हम सब भी यहाँ पर किरायेदार ही हैं, तो जितना टाइम मिला है, उसको सही से बिता लो, अच्छे काम करो, नहीं तो ऊपर वाला औकात याद दिलाने में टाइम नहीं लगाता।

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