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बदलता जीवन

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Goat
बदलता जीवन

बदले है घर के परिवेश
बढ़ रहे हर जगह है क्लेश
हो रहा है क्यों ये राग – द्वेष
अब बचा नहीं कुछ भी है शेष
क्यों रिश्ते रखे हमने ताक में
वक्त की साख मिली खाक में

मृदुभाषा नहीं कटुवाणी है
आपस में लड़ते प्राणी है
होते नहीं मन अब दानी है
बस सबके यही कहानी है
प्रेम – निर्झर मिल गया राख में
विश्वास की साख मिली खाक में

ह्रदय हुए हैं व्यथित अब
नयन हुए हैं द्रवित अब
क्या खोया क्या है संचित अब
ये बातें होगी विदित कब
आ गए अश्रु अब देख आँख में
लहरों की साख मिली खाक में

अब बात नहीं होती है घरों में
सब उड़ते है कल्पित शिखरों में
जल सूखा पड़ा है नहरों में
और स्वच्छता नहीं है शहरों में
ईमान बिकता है हजार-लाख में
सच की साख मिली खाक में

मन के बिना अब हाथ मिलते हैं
पुष्पों की जगह काटें खिलते हैं
ख्वाब नहीं अब षड़यंत्र पलते हैं
दिए नहीं अब घर जलते हैं
बनते है शस्त्र बर्तन की चाक में
श्रद्धा की साख मिली खाक में

मेरी कलम लिखती है ये बताने
अब नहीं रहे वो गुजरे ज़माने
जब सबके कर में ज्योति जगाने
चल पड़े थे वो पागल मस्ताने
आजादी गुमी घृणित लड़ाक में
बलि – त्याग की साख मिली खाक में

पहले मिट्टी भी चन्दन थी
पहले विनती ही वंदन थी
पर अब तो धूल भरी है मिट्टी
औपचारिक होती है चिट्ठी
नहीं भाव पत्र होते है डाक में
निष्ठां की साख मिली खाक में

हे मानव…

धोकर पवित्र करो तुम मन को
प्रेम रखो और द्वेष को फेंको
दुर्भाव तंजो और क्लेश को रोको
इतना तुम एक बार तो सोचो
फिर रहेगा दुःख किसकी फिराक में
गौरव हो फिर मन की साख में

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