Home साहित्य मिरे तकिये मे कई रातें बिखरती हैं

मिरे तकिये मे कई रातें बिखरती हैं

9253
186
मिरे तकिये मे

मिरे तकिये मे कई रातें बिखरती हैं
लब ग़ुलाम हैं और शिकायतें सुलगती है

पूरे चाकचौबंद से हिफ़ाज़त का मुआईना किया
पर एक सुराख से ही तो दीवारें उखड़ती है

यूँ बेसाख्ता बिछड़ा मुझसे मेरे मन का मीत
उसकी तलाश मे रोज़ नयी रहगुज़र बदलती है

ये चाँद, स्याह रात का चश्मदीद बन गया
रोशनी फिर अधपकी सी आसमान से गिरती है

खंजर मीठा चुभोकर मरहम ज़हर का दे दिया
यहाँ इसी तरह दोस्ती की सौगात मिलती है

दास्तान वो पल दो पल की है जिसे रहनुमाई कहते हैं
बाद मे वो जल्लादों के ज़मीर पर फुदकती है

कौन है जो है एक दूसरे की अकीदत करता है
यहाँ पर तो इज़्ज़त भरे बाज़ार मे उछलती है

तेरे ईमान की खुशबू बड़ी ही ज़हीन थी
अब तो वो गुंड़ों के मुहल्ले मे उड़ती है

भीड़ की रोशनाई में एक शख़्स तन्हा है
ज़िंदगी से मौत तक बसे ऐसे ही गुज़रती है

मैं कौन से काफिले मे शामिल होने जाऊं
ना ज़िंदा मे शामिल हूँ ,ना मौत मे गिनती है

ख़ौफ़ ये है, कहीं धोखेबाज़ी का लबादा ना हट जाये
इसीलिए अपनी ज़हनीयत सच से मुकरती है

मुझे अपने बेहोश होने के ज़रा सा भी इल्म नहीं
समझ तब आता है जब लानतें मिलती है