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मुकम्मल भी हुआ तो क्या हुआ

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Broken Heart
मुकम्मल भी हुआ तो क्या हुआ

मुकम्मल भी हुआ तो क्या हुआ
ये इश्क़ है अपनी नादानी कहां छोड़ता है

कभी तो खयालों को बसाता है
और कभी सारे सपनो को तोड़ता है

पन्ने पलटने में देर नहीं लगती
और हवाओं का रूख भी मोड़ता है

अकेले बैठे ये सोचता हूं दिन भर
कि क्यों ये दिल मुझे हर रोज टटोलता है

खामोश तो मेरी जुबान रहती है
अंदर तो दिल का जलवा बोलता है

बिखरे पत्थरों को कोई नहीं उठाता
और टूटे दिलों को भी कौन जोड़ता है