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रोज़ देखता हूँ आसपास तो

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रोज़ देखता हूँ आसपास तो
रोज़ देखता हूँ आसपास तो

रोज़ देखता हूँ आसपास तो
सवालों से भरे चेहरे परेशां करते हैं
वही बेचैनी, वही नाकामयाबी और वही फितूर
इतने सारे जज़्बात भी हैरान करते हैं

चलते हुए एक मिटटी का ढेला मिला
तो सरपट से उठा लिया
कुछ सोचा नहीं और नदी के किनारे बैठ गया
आँखों के आगे अंधेरों के सागर हैं
न कम न ज़्यादा सभी बराबर हैं

बस चंद लम्हों के लिए गालों पर गड्ढे पड़ते हैं
थोड़ी ही देर में सैलाबों से चेहरे ढकते हैं
ज़ोर कुछ नहीं बस ज़बरदस्ती का दौर हैं
अपना कोई रास्ता नहीं, ना कोई ठौर है

कोई एहसान दिखा कर दो टुकड़े फेंकता है
पर ज़मीर अपने वजूद को अच्छे से सहेजता है
मलाल रखने का वैसे तो कोई शौक नहीं
मगर आवाज़ उठाने का हमेशा शऊर रहेगा
मैं काबिल बनूँ या न बनूँ ये वक़्त के हाथ है
पर कोशिशों का सिलसिला ज़रूर रहेगा
वो इत्तेफ़ाक़ ही था कि जिस शब का मैं इंतज़ार कर रहा था
उसमे चाँद गायब हो गया था
शायद वो चौथ की रात होगी, जिसमे अमावस का साया रहता है,
कुछ हर्फ़ बमुश्किल से इकट्ठे किये थे की तेरे साथ दर्द-मंज़र करेंगे
पता नहीं था कि एहसासों में बर्फानी जीस्त चढ़ गयी
अब तो गर्म हवाओं का शोर
आसमान बनिस्बत ज़मीन में खामोश दबा होगा
मैं उफ़क तक देखता हूँ तो
तारों भरी शाम से भी चांदनी का नूर कम नहीं होता
अफ़सोस उस दिन अँधेरे का लबादा ओढ़े पूरा मौसम मेरे कंधे पर बैठ शहर को निहार रहा था
ज़र्द चेहरों में सन्नाटा अपने घरोंदों के लिए ज़ख्मों की दीवारों और सदमों की ईंटो को सजा रहा है
गोया मेरी नब्ज़ों में साँसों की गिनती थोड़ी कम ही है, जैसे कोई जुगनू एक रात में गुज़र जाता है

कठिन शब्द और उनके अर्थ:
फितूर- पागलपन
हर्फ़- अक्षर, शब्द
जीस्त- जिंदगी , जीवन
उफ़क- क्षितिज, वह स्थान जहाँ आकाश और पृथ्वी दोनों मिले हुए जान पड़ते हैं
गोया- जैसे, मानों
शऊर- तरीक़ा, ढंग
ठौर- जगह, स्थान, ठिकाना
सैलाब- बाढ़
ज़र्द- पीला