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सांसें उखड़ रही है… भाग -2

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Covid 19
सांसें उखड़ रही रही हैं

सांसें उखड़ रही रही हैं
जिंदगी उजड़ रही हैं
ना पैसे का रूवाब है
ना वक्त की बिसात है

ये अपने सीने में जज़्ब कर लेगा
ज़हर है, नसों में दर्द कर देगा

कितनी और चीखें चाहिए
कितनी शोक सभाएं
लाचार जान बचाने को
हम सरकार से गिड़गिड़ाएं

नालायक सरकार अब और भी विषधर हो गई
जिन सांसों को हवा चाहिए वो जहर हो गई

संक्रमण ने सबको विवश कर दिया
शमशानों और मुर्दाघरों को व्यस्त कर दिया

कोई जवान बेटा अपनी मां से बिछड़ गया
किसी का पति असमय चार कंधों पर पड़ गया
कोई पिता बच्चों और मां को अकेला छोड़ गया
किसी भाई की मौत ने बहन को अंदर तक तोड़ दिया

कोई घर की बेटी की लाश पर बिलखते हैं
कोई पत्नी के अवसान पर बच्चों को संभालते हैं

किसी घर की लक्ष्मी बहु घर से दूर हुई
किसी मरती मां के आंचल में बच्चों की दुनिया चूर हुई

वो दावे कहां है वो वादें कहां है
जिन्होंने कहा था जान है तो जहान है

शर्म भी जैसे बेचकर खाते हैं
आप तो हवा की दलाली भी पचाते हैं

कहते हो खुद को दिल्ली का राजा
मगर सबको तुमने भिखारी बनाया

देश के प्रधान कहां खो गए हैं
लगता है जैसे कहीं सो गए हैं

जिसके घर से लाश जाएगी
उसको किसी पार्टी की भक्ति न भाएगी

पहले जीवन है फिर सरकार है
अगर जीवन नहीं तो वोट देना बेकार है

उम्मीदें थे आपसे, हमेशा रहेंगी
मगर ऐसे ही जब जिंदगी मरेगी
तो कैसे कोई आपका साथ देगा
क्यों अपने समय को बरबाद करेगा

जीवन बचाना काम है आपका
नहीं तो मिटेगा निशान आपका

कहां तक खुद को समझाएं
कैसे दर्द पे हम ना कराहें

जलता हुआ शमशान और बेखत्म धुआं
कम पड़ता कब्रिस्तान और बेरहम जहां
लाशों का शहर और उजड़ते आशियां
हर तरफ से आ रही है असहनीय सिसकियां

हथेली अब मौत की डगर चल रही है
धीरे धीरे सबकी धड़कन उलट रही है
सोचता हूं कि जिंदगी के बहुत से रंग देखे
अब मौत के बाजार में हम खुद को धकेले

लाचार हूं कि अब नहीं होती चीखें सहन
किसी अपने के जाने से रोती है मां बहन

अब इंतजार है कि या तो सांस पकड़कर लड़ता रहूं
या मौत के अनजाने सफर पर चलता रहूं।

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