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तू कहती है कि मैं तेरा ख्वाब हूँ

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तू कहती है कि मैं तेरा ख्वाब हूँ

तू कहती है कि मैं तेरा ख्वाब हूँ
फिर क्यों तू मुझे हकीकत में नहीं दिखती

सुना है कि इश्क़ में लोग चिठ्ठी लिखते हैं
फिर तू मुझे खत क्यों नहीं लिखती

इन दीवारों में पत्थर दबे हैं
तेरी सूरत में जज़बात ढकें हैं
मैंने भी अपने दर्द को छुपाना सीख लिया
फिर तू क्यों जज़्बात छुपाना नहीं सीखती

सामने मेरी कई शख्स खड़े हैं
उनसे मैं अपनी बात नहीं कह सकता
तेरी आरज़ू में पूरी उम्र गुज़र गयी
फिर भी तुझे याद किये बिना रह नहीं सकता
जहाँ पेड़ों पर चहचाहती चिड़िया थी
अब वो उस जंगल में नहीं उड़ती

कितने मक़ाम थे जो तय किये थे हमने
किसी को मंज़िल मिली किसी की राह खो गई
कुछ इस तरह से ज़िन्दगी ने करवट ली
कि तुझे मिलने की चाह खो गई
बिछड़े हुए हमराहों की किस्मत नहीं जुड़ती

तू कहती है कि मैं तेरा ख्वाब हूँ
फिर क्यों तू मुझे हकीकत में नहीं दिखती

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