कोई शिकन भी माथे पर ठहरती नहीं
कोई शिकन भी माथे पर ठहरती नहीं कभी तो कोई दाग दामन पर रहा होगा
कोई शिकन भी माथे पर ठहरती नहीं कभी तो कोई दाग दामन पर रहा होगा
मिरे तकिये मे कई रातें बिखरती हैं लब ग़ुलाम हैं और शिकायतें सुलगती है पूरे