अंधविरोध से देशविरोध तक

Delhi Riots

मैं झूठे आरोपों और बरगलाने के लिए आता हूँ
मैं खानदानी डकैतों को किसान बताता हूँ

अंधविरोध के चक्कर में अपनी मर्यादा भूल जाता हूँ
पंत प्रधान के अपमान में देश का अपमान करवाता हूँ

एक परिवार की भक्ति को ही देश भक्ति बताता हूँ
खालिस्तानी आतंकवादियों के जूते चाटता हूँ

1984 के नरसंहार को भूल जाता हूँ
मगर तुष्टिकरण से बहुसंख्यकों को दबाता हूँ

पहला हक़ इस देश पर मुसलमानो का है
इस घटिया बयान को भी दोहराता हूँ

देश के बंटवारे तो मैंने 1947 में ही कर कर दिया था
अब जगह जगह पाकिस्तान बनाता हूँ

अपनी पार्टी से चुने हुए प्रधान की हत्या पर तो रोना आता है
पर किसी दूसरी पार्टी के पंत प्रधान को ड्रामा बताता हूँ

मुझे देश के बारे में कुछ नहीं पता और न ही अपने कर्तव्य के बारे में
शोक सन्देश भी मोबाइल से देखकर सुनाता हूँ

जब भी देश पर विप्पत्ति आती है तो देश छोड़कर चला जाता हूँ
कोई मुझे बुद्धू कहे या नाटकबाज झूठ से बाज़ नहीं आता हूँ

देश विरोधी ताकतों को अपनी पार्टी में लेता हूँ
और फिर देश के बेडा गरक करवाता हूँ

कितने ही घोटाले और कितने ही मक्कारी की है मैंने
मगर फिर भी हमेशा कीचड चाटता हूँ

नंगे सामजवाद से जाती और धर्म विशेष की घटिया राजनीती करता हूँ
मैं वो हूँ जो अपने बाप को भी नहीं बख्शता हूँ

प्रधानमंत्री को गाली देना अपना हक़ मानता हूँ
मगर इंदिरा, राजीव और नेहरू जैसे तानाशाहों के लिए मुँह में दही जमाता हूँ

भागलपुर का दंगा और दिल्ली दंगे पर कान बंद करता हूँ
मगर अपनी सुईं को 2002 से आगे नहीं बढ़ पाता हूँ

कश्मीर समस्या के जनक नेहरू का महिमांडन करता हूँ
दान में अक्साई चीन देने वाले को महान बताता हूँ

देश में 1975 का आपातकाल इतिहास में तानाशाही का चरमकाल था
मगर उसका ज़िक्र आने पर कुतर्क करने आ जाता हूँ

दलित और वंचितों की आवाज़ बनने का ढोंग करता हूँ
मगर अरबों रूपए में अपनी मूर्तियां बनवाता हूँ

भारत के प्रतीकों, राष्ट्र गान, और राष्ट्रीयता के मानकों का अपमान करता हूँ
मैं सड़ी हुई वामपंथी मानसिकता से देश को लड़वाता हूँ

दो चार मंडियों के मालिकों को किसान का नाम देता हूँ
और उन दलालों की खरबों के बेईमान सम्प्पति पर कन्नी काट जाता हूँ

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सांझी बात एक विमर्श बूटी है जीवन के विभिन्न आयामों और परिस्थितियों की। अवलोकन कीजिए, मंथन कीजिए और रस लीजिए वृहत्तर अनुभवों का अपने आस पास।

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