किराया

hand of man on fence with nature

हम लड़खड़ाते ज़मीर को सहारा देते हैं
अपने सड़े हुए जिस्म को साया देते हैं

रूह तो फिर भी पाक साफ रहती है
शरीर को नकली सांस और हवा देते हैं

सामान कुछ रहा था मेरा उनके पास
पर वो अश्कों की किश्तों का बकाया देते हैं

खामोशी का भी अपना सुरूर होता है
और वो लोग फिर भी शोर को बढ़ावा देते हैं

उन्होंने तो रब को कोसा और पत्थर बता दिया
फिर भी खुदगर्जी का वहां चढ़ावा देते हैं

खुश कौन रहता है आजकल यारों
हम तो चेहरे को दर्द छुपाने का किराया देते हैं

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सांझी बात एक विमर्श बूटी है जीवन के विभिन्न आयामों और परिस्थितियों की। अवलोकन कीजिए, मंथन कीजिए और रस लीजिए वृहत्तर अनुभवों का अपने आस पास।

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