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कूड़े का यार

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कूड़े का यार
कूड़े का यार

अक्सर मेरे और मेरी पत्नी के बीच इस बात पर बहस हो जाती है कि सर्दियाँ अच्छी है कि गर्मियां। मैं ठहरा उत्तराखंड के छोटे से गाँव का रहने वाला , तो मुझे बर्फीली हवाओं और पहाड़ियों से तो वैसे भी लगाव है, पर मेरी पत्नी जो की महाराष्ट्रियन है (माफ़ करना मैं यहाँ पर बताना भूल गया कि हमारा अंतर्जातीय विवाह हुआ था) उसे ठण्ड बिलकुल भी पसंद नहीं है, हालाँकि जब वो टीवी पर अच्छे अच्छे पहाड़ों और सीनरी में फिल्म अभिनेता और अभिनेत्रियों को गाते और नाचते देखती है तो मन उसका भी प्रफुल्लित हो जाता है, खैर ये तो रही मेरी निजी ज़िन्दगी की कुछ झलकियां पर एक रात मेरे साथ कुछ ऐसा हुआ जिसने मेरी ज़िन्दगी जीने और सोचने के तरीके को बिलकुल बदल दिया। इस से पहले कि मैं आपको पूरा वाकया सुनाऊँ मैं अपना एक छोटा सा परिचय दे देता हूँ, मैं हूँ विमर्श त्रिवेदी, एक स्थानीय अखबार का संपादक हूँ, रोज़ नयी नयी ख़बरों की खोज में दिन रात एक कर देता हूँ और इसलिए नहीं कि मुझे ख़बरें खोजने का जूनून हैं, नहीं भाई हम अपने काम के प्रति ज़िम्मेदार तो हैं मगर ईमानदारी से कहें तो , दाल रोटी का इंतज़ाम भी करना ही पड़ता है, इस छोटी सी पत्रिका को चलाने के लिए बहुत माथापच्ची और संघर्ष लगा है भाई लोगों तब जाकर ये लोगों के दिलों तक पहुंच पाई है।

मैं ये नहीं कहता कि मैं एक विशुद्ध परम्परागत पत्रकारिता का समर्थक हूँ पर मैं इतना ज़रूर मानता हूँ कि कोई भी खबर जिस से आम लोगों के जीवन में गेहूं के दाने के बराबर भी असर पड़े तो उसको छोड़ना नहीं चाहिए। हालाँकि आज मैं अपने जीवन में घटी हुई एक घटना से प्रेरित प्रसंग सुना रहा हूँ। पत्रकार और साहित्य का छोटा मोटा प्रशंसक होने के नाते इस घटना को आपको कहानी के रूप में बता रहा हूँ अब ज़्यादा देर न करते हुए शुरू करता हूँ हुआ यूँ कि एक दिन पत्नी जी ने घर पर ही बहुत ही अच्छा साम्भर बनाया और हमने भात (पके चावल को पहाड़ी भाषा में भात कहते हैं) के साथ उसे खाया|खाना काफी स्वादिष्ट होने के कारण हमसे कण्ट्रोल नहीं हुआ और हमने जो है भूख से थोड़ा ज्यादा खा लिया। अब खा तो लिया लेकिन इस से क्या हुआ की उठना और बैठना दूभर हो गया। तो सोचा कि क्यों न घर से थोड़ा कदम पर दूर पार्क में टहला जाये तो मैंने पत्नी जी से कहा “मैं पार्क जा रहा हूँ थोड़ा टहलने ताकि खाना पच सके” पत्नी जी ने मौके के भरपूर फायदा उठाते हुए कहा, “अगर आप पार्क जा ही रहे हों तो कूड़ा जो घर में जमा हो रखा है, डस्टबिन में उसको पार्क के रास्ते में पड़ते हुए कूड़ेदान में डाल देना”। थोड़ा खीजता हुआ मैं पत्नी जी से बोला, “लाओ भई अब ये काम भी करना रह गया था”। बड़े बड़े डस्टबिन नगर निगम ने कूड़ेदान में लगाए थे जिस से कि वहां के रहने वाले निवासी कूड़ा इधर उधर न डालकर सीधे उन डस्टबिनों में डालें।

अब जैसा कि आपको मैंने बता ही दिया कि मैं एक स्थानीय पत्रिका का संपादक हूँ और इन चीजों और अपने नागरिक कर्तव्यों के प्रति मैं हमेशा सचेत रहता हूँ| मैं यहाँ अपनी प्रशंसा बिलकुल नहीं कर रहा बल्कि मैं तो लोगों को अवगत करवाना चाहता हूँ कि उनको एक ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते अपने अधिकारों के साथ साथ अपने कर्तव्यों को भी ठीक प्रकार से निर्वहन करना चाहिए। मेरा कर्तव्य भी मुझसे कह रहा था कि कूड़ेदान को डस्टबिन के अंदर ही डालना है , जैसे ही मैंने कूड़ा उसमे डाला, अचानक से के 13-14 साल का लड़का जिसकी कमीज बहुत मैली थी और उसका रंग मिटटी और काई से भी गहरा था मगर उसकी कूड़े में कुछ ढूंढने की तन्मयता ने मुझे हैरान कर दिया। मैं समझ नहीं पा रहा था कि वो उस बेकार के कूड़े में क्या ढूंढ रहा है। खैर मेरी उसे देखने की जिज्ञासा और बढ़ती गयी फिर मैंने उसको आवाज़ दी और पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है उसने कहा ‘अंकल दीपक’, मैंने पूछा “यहाँ क्या कर रहे हो स्कूल नहीं जाते क्या” उसने जवाब दिया “स्कूल जाने पैसे भी तो चाहिए और उतने पैसे हमारे परिवार के पास नहीं है”, “तो फिर इस कूड़ेदान में क्या ढूंढ रहे हो” मैंने दोबारा जिज्ञासावश पूछा । उसने कहा “कूड़े में कुछ काम की चीजें ढूंढ़ रहा हूँ जिससे कि मैं बेच सकूं और फिर जिस कबाड़ी को बेचूंगा वो मुझे कुछ पैसे देगा। “ओह”, मगर इतनी सर्दी में तुम्हे ठण्ड नहीं लग रही” मैंने पूछा, तो उसने कहा “भूख तो ठण्ड से भी निर्दयी है साहब, इसके लिए तो करना पड़ेगा”, इतने छोटे बच्चे के मुँह से निकले हुए ज़िन्दगी के सबसे कड़वे सच को सुनने के बाद मुझे अपना ज्ञान और अपनी सम्पन्नता उसके सामने छोटी लगी।

मैंने जेब में कुछ टटोला और देखा कि 10 रुपये पड़े थे ,तो मैंने उसे देना चाहा, उसने मना कर दिया और कहा साहब मैं भिखारी नहीं हूँ कूड़ा ज़रूर बीनता हूँ मगर किसी का मोहताज नहीं हूँ। सहसा मन में उसके प्रति इज़्ज़त और बढ़ गयी “वाह क्या खुद्दारी है “बस यही शब्द निकले हृदय से। फिर मैंने कहा “माफ़ करना बेटा मुझे गलत मत समझना ,मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकता हूँ तो बताओ”, पहले तो वो मुझे 1 मिनट तक सर से पाँव तक देखता रहा उसके बाद कहने लगा “अंकल वैसे तो मैं किसी की मदद नहीं लेता मगर आप काफी अच्छे भले लगते हो, अगर हो सकता हैं तो गर्मागर्म चाय पिला दो। मैंने कहा तो चलो और पास में ही चाय की एक टपरी थी उसमे हम दोनों ने चाय ली और फिर मैं उससे बात करने लगा औरबातों बातों में मैंने पूछ लिया कि उसके परिवार में कौन कौन है, तो उसने बताया “पिताजी तो बहुत पहले गुज़र गये थे शराब की लत के कारण घर में अब सिर्फ मैं और माँ है, मेरी माँ घर पर कपडे सिलती है तो किसी तरह गुज़ारा हो जाता है, माँ तो चाहती है कि मैं पढूं मगर हालात इतने अच्छे नहीं है कि पढाई के लायक पैसे हो जाएँ।”, फिर मैंने उस से कहा “तुम सच में पढ़ना चाहते हो तो मैं तुम्हारी सहायता कर सकता हूँ, मगर मेरी एक गुज़ारिश है कि तुम इसे एहसान मत समझना” उसने कहा “ठीक है अंकल विद्या तो बड़ी मुश्किल से मिलती है तो फिर ये कहीं से भी मिले ये तो मेरा सौभाग्य है”।

जीवन में अच्छा करने का अवसर जब भी मिले तो कर लेना चाहिए , उस लड़के दीपक की हामी के साथ मुझे काफी ख़ुशी हुई और मैंने उसकी पढाई का ज़िम्मा अपने सर ले लिया |आज उस बात को तकरीबन 20 साल हो गए। आज वो लड़का अपने नाम की तरह अपनी माँ का नाम रोशन कर रहा है। स्कूली शिक्षा के बाद उसने पॉलिटेक्निक में डिप्लोमा किया और इंजीनियरिंग की। कूड़े कचरे का उसके जीवन में बहुत प्रभाव था तो उसने इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट प्रबंधन और रीसाइक्लिंग में बहुत रिसर्च किया और आज वो एक सफल उद्यमी है, आज उसकी इ -वैस्ट मैनेजमेंट का अपना व्यवसाय है , आज वो देश को उस कचरे से निज़ात दिला रहा है जिसको कभी वह अपने गर्दिश के दिनों में बीनता था| उसे कहाँ अंदाज़ा था कि कूड़े से उसकी यारी उसको कहाँ से कहाँ पंहुचा देगी। दीपक हर हफ्ते मुझसे मिलने आता है, और मुझे सोशल पापा कहकर बुलाता है। मैंने तो उसे काफी मना किया, मगर उसने सम्मान देने के लिए मुझे अपनी कंपनी के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर में स्थान दिया है? खैर ये तो थी मेरी कहानी बस इतना ही कहना चाहता हूँ कि प्रतिभाओं की कमी नहीं है देश में बस उनको सही दिशा और पर्याप्त साधन मिले तो वो किसी भी मंज़िल को पा सकते हैं।

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