क्यों हो रहा है निराश

उठ! क्यों हो रहा है निराश
अब मत हो तू इतना हताश
जीवन अभी बहुत पड़ा है
क्यों जीवन से रूठा खड़ा है
कठिनाई का करना होगा सामना
वक़्त का हाथ अब तुझको है थामना
कर दें घनघोर विपदाओं का विनाश
उठ! क्यों हो रहा है निराश

माना कि जीवन में आता है पतझड़
पर तू उससे डटकर लड़
आएगा तेरे जीवन में दोबारा बसंत
तेरे पास भी होगी खुशियां अनंत
पुष्पों से महका अपने ह्रदय को
दूर कर अपने अंदर के विलय को
अपनी अन्तरात्मा का कर विश्वास
उठ! क्यों हो रहा है निराश

एक दुःख से जीवन नहीं रुकता है
एक चोट से पत्थर नहीं टूटता है
शक्ति को सम्पूर्ण कर कार्य में लगा
सुप्त होकर जो लावा पड़ा है उसको जगा
क्यों तेरा मन इस तरह अलसित है
छोड़ दे अपना ये रोदन क्यों तू व्यथित है
पड़ा क्यों है ऐसे जैसे हो तू ज़िंदा लाश
उठ! क्यों हो रहा है निराश

अब नए स्वपनों को कर आमंत्रित
जीवन को अपने कर ले व्यवस्थित
निर्मल कर अपने भावों के संचार को
कर दे विस्तृत अपने गगनरूपी विचार को
तभी होगा तेरी समस्याओ का समाधान
जीवन की गतिविधियों का होगा तुझे ज्ञान
रह सत्य के युग में न खो अपने होश-ओ हवाश
उठ! क्यों हो रहा है निराश

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सांझी बात एक विमर्श बूटी है जीवन के विभिन्न आयामों और परिस्थितियों की। अवलोकन कीजिए, मंथन कीजिए और रस लीजिए वृहत्तर अनुभवों का अपने आस पास।

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