आगामी 24 अप्रैल 2026 को मोतिहारी के ‘भारत स्काउट और गाइड’ परिसर से प्रातः 7 बजे महिला साइकिलिस्टों का एक दल प्रस्थान करेगा। यह दल भरौलिया, चिरैया और ढाका होते हुए ऐतिहासिक सिरौना गाँव के ‘कस्तूरबा सेवाश्रम’ पहुँचेगा। इसके पश्चात, सिरौना गाँव के उच्च विद्यालय में इन वीरांगनाओं को सम्मानित किया जाएगा।
इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को शिक्षा के प्रति जागरूक करना, उन्हें आत्मनिर्भर बनाना और लंबे समय से उपेक्षा का शिकार रहे कस्तूरबा गांधी सेवाश्रम को राष्ट्रीय पटल पर पहचान दिलाना है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: चुल्हिया और कस्तूरबा का वह संवाद
इतिहास गवाह है कि जब चंपारण के किसानों पर अंग्रेजों का अत्याचार चरम पर था, तब बाबू लोमराज सिंह और पंडित राजकुमार शुक्ल के अथक प्रयासों से महात्मा गांधी का आगमन 15 अप्रैल 1917 को चंपारण की धरती पर हुआ। गांधी जी ने चंपारण के किसानों का दुःख-दर्द जानने के लिए जिले के कोने-कोने में अपने स्वयंसेवकों को भेजा। इसी ऐतिहासिक यात्रा के दौरान कस्तूरबा गांधी सिरौना गाँव पहुँची थीं।
वहाँ उनकी मुलाकात ‘चुल्हिया’ नामक एक श्रमिक महिला से हुई। कस्तूरबा जी ने चुल्हिया की झोपड़ी के पास कुएं पर ग्रामीण महिलाओं की चौपाल लगाई और चुल्हिया के गंदे बालों से ढील (जूं) साफ करने लगीं। देखते ही देखते वहाँ गाँव के निर्धन बच्चे भी जमा हो गए। जब कस्तूरबा जी ने उन बच्चों की पढ़ाई की बात की, तो चुल्हिया ने बड़ी बेबाकी से कहा- “हमारे परिवार का हर सदस्य सेर भर अनाज की कमाई पर जिंदा है, हम पढ़ाएं कैसे?” उसने गाँव में ही स्कूल खुलवाने की मांग रखी।
चुल्हिया के इसी विचार और साहस से प्रभावित होकर कस्तूरबा जी ने गांधी जी को अपना प्रतिवेदन सौंपा। गांधी जी ने स्कूल खोलने के लिए कोठीवाले साहब और जिला कलेक्टर से जमीन की मांग की, परंतु जमीन नहीं मिल सकी।
अंततः, बेतिया राज के सीर कब्जे वाले क्षेत्र बड़हरवा लखनसेन में वहाँ के किसान बाबू शिवगुलाम लाल के बंगले में 13 नवंबर 1917 को देश के प्रथम ‘बुनियादी विद्यालय’ की स्थापना हुई। यहाँ चरखा, बागवानी, बढ़ईगिरी और चर्मकारी जैसे हुनर सिखाए जाने लगे, ताकि शिक्षा रोजगारोन्मुखी बन सके।
उपेक्षा और हमारी मांग
सिरौना गाँव जिले के सर्वाधिक स्वतंत्रता सेनानियों की जन्मस्थली है, जहाँ दर्जनों ताम्रपत्र धारी सेनानियों का गौरवशाली इतिहास है। प्रसिद्ध शिक्षाविद श्री रत्नेश्वरी शर्मा जी के अनुसार, बुनियादी शिक्षा के विचार को जन्म देने वाली चुल्हिया की यह धरती और कस्तूरबा गांधी का वह वार्तालाप स्थल आज भी सरकारी उपेक्षा का शिकार है। अंग्रेजों द्वारा जमीन नहीं देने के कारण, आजादी के बाद सन् 1959 में ग्रामीणों के सहयोग से यहाँ स्कूल खोला गया, जो आज इंटर स्तरीय उच्च विद्यालय के रूप में स्थापित है।
हमारी सरकार से मांग है कि:
- सिरौना गाँव में कस्तूरबा गांधी विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए। इसके लिए हम ग्रामीण स्वेच्छा से भूमि उपलब्ध कराने के लिए तैयार हैं।
- सिरौना गाँव को आधिकारिक रूप से ‘गांधी सर्किट‘ से जोड़ा जाए।
कस्तूरबा गांधी सेवाश्रम के माध्यम से गाँव के नवनिर्माण का संकल्प
कस्तूरबा गांधी सेवाश्रम का उत्तरदायित्व गाँव के चहुंमुखी विकास पर होगा, जैसे:
- गाँव की कछुआ नदी और खेतों तक जाने वाली नहरों की सफाई व देख-रेख।
- पुराने और विलुप्त हो रहे कुओं का जीर्णोद्धार।
- गाँव के पोखरों और प्राचीन मठ-मंदिरों का संरक्षण ताकि हमारी विरासत सुरक्षित रहे।
- गाँव के निर्धन, असहाय और वृद्ध लोगों की सेवा का दायित्व उठाना।
आप सभी ग्रामवासियों और क्षेत्रवासियों से विनम्र अनुरोध है कि आगामी 24 अप्रैल को अधिक से अधिक संख्या में सिरौना हाई स्कूल पहुँचकर इस कार्यक्रम को सफल बनाएँ और अपने बहुमूल्य विचार साझा करें।