कुछ अशआर दिल से…

Kuchh asaar dil se

सजे उस बाग में मेरे दिल की क्यारी
जहां तेरे कदमों की आहट पड़ी हो

महज कुछ पलों का ही फासला था
तय करते करते उम्र ही गुज़र गई

कहीं शोर होता तो लपक लेता
यहां तो चुप्पी से दिन रात भरे हैं

गौर करना अब मेरी आदत नहीं
कितने लोगों ने मुझे अनदेखा किया

सांस तो इत्मीनान की हवा लाती है
मगर जिस्म फिर भी सिहरन से भरा है

तिरे पहलू में अपनी तबीयत छोड़ दूं
हाल ये है कि अब सांस भी नहीं रही

तकल्लुफ क्या करूं कि कोई नहीं है
अब तो मेहमां भी आने से कतराते हैं

मेरे मिज़ाज की फिक्र न करो
बस अपने तेवर को संभाल कर रखो

बदजुबानी नश्तर के जैसे चुभती है
शायद इसका ज़हर से कोई नाता है

~राजेश बलूनी प्रतिबिंब

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सांझी बात एक विमर्श बूटी है जीवन के विभिन्न आयामों और परिस्थितियों की। अवलोकन कीजिए, मंथन कीजिए और रस लीजिए वृहत्तर अनुभवों का अपने आस पास।

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