बिखरा – बिखरा सब हिल गया है

बिखरा – बिखरा सब हिल गया है
टुकड़ा टुकड़ा मेरा दिल हुआ है
सपनो के इस आकाश में
उड़ता पंछी गिरने लगा है

बंजर इस धरती का कोना
किसने चाहा बीज का बोना
हर कोई बस मरने लगा है
बिखरा – बिखरा सब हिल गया है

मेरे मन में गहरा सूना
अश्क अधूरे दर्द है दूना
खालीपन बस अब पसरा है
बिखरा – बिखरा सब हिल गया है

बेचेहरा सी क्यों है यादें
धुंधली शामें, हल्की रातें
हर मौसम में डर लगता है
बिखरा – बिखरा सब हिल गया है

काफी है उम्मीद की कश्ती
पानी से भी आग बरसती
अंगारो में सर्द हवा है
बिखरा – बिखरा सब हिल गया है

मै कैसे कदमों को बढ़ाऊँ
मंजिल क्या, रास्ता खो जाऊं
दिल भी अब दुखने लगा है
बिखरा – बिखरा सब हिल गया है

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सांझी बात एक विमर्श बूटी है जीवन के विभिन्न आयामों और परिस्थितियों की। अवलोकन कीजिए, मंथन कीजिए और रस लीजिए वृहत्तर अनुभवों का अपने आस पास।

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