होश खो रहे हैं

मिरे तकिये मे

होश खो रहे हैं हम उनको कुछ फ़िक्र नहीं है
क्या प्यार है ये, या कोई चेहरा लगा है

दुख रहा है दिल उनको ये भी पता है
उमर भर साथ रहना का वादा भी मर रहा है

बाहर से तो ठीक हू मगर अंदर से दिल जल रहा है
अब आँसू भी गायब हुए और खून भी सूख गया है

मेरा तो मुझसे सब कुछ छिन सा गया है
चेहरा क्या माथा भी झुलसा गया है

अब तो मेरी साँसें भी अपना मुँह मोड़ गई हैं.
दिल के दरवाज़ों को शीशों सा तोड़ गयी हैं

बंजर धरती सा पड़ा है ये शरीर उनको ये इल्म नही है
ये मेरी ज़िंदगी की हक़ीकत है जनाब कोई फिल्म नही है

~अभिषेक जुयाल ‘पण्डित’

About the Author

admin

सांझी बात एक विमर्श बूटी है जीवन के विभिन्न आयामों और परिस्थितियों की। अवलोकन कीजिए, मंथन कीजिए और रस लीजिए वृहत्तर अनुभवों का अपने आस पास।

You may also like these