सांसें उखड़ रही है… भाग -1

सांसे उखड़ रही है वक्त से पहले
उम्र भी पहले ही खत्म हो रही है

जिंदगी को बचाने की जद्दोजहद है
आस भी जीने की कम हो रही है

सोचा था कुछ पल फुरसत के जियूंगा
अब वो ख्वाहिशें भी दम तोड रही है

कैसे खुशी के समा को बनाए रखूं
वक्त की हर आहट गम छोड़ रही है

चेहरे से तो उसके भोलापन झलकता था
मगर हरकतें उसकी भरम तोड़ रही है

लिहाज़ कौन करता है, सब बेअदब हैं
सामने खड़े होने में भी शर्म हो रही है

ठंडी सांसें आजकल मौत का इशारा है
मगर बीमार होने पर सांसे गर्म हो रही है

कभी खामोखा मैं अपनी जीस्त से खेला
अब बदन में ताकत कुछ कम हो रही है

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सांझी बात एक विमर्श बूटी है जीवन के विभिन्न आयामों और परिस्थितियों की। अवलोकन कीजिए, मंथन कीजिए और रस लीजिए वृहत्तर अनुभवों का अपने आस पास।

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