खुल रहे है दस्तावेज तो चिढ रहे हो

The Kashmir Files

सांप से ही दोस्ती पाली थी हमने
चांवल की बोरी में धंसकर मरोगे

जिरह क्या करना जब सुनवाई नहीं है
बेकार में क्यों किसकी दलीले सुनोगे

वक़्त होते हुए सम्भले नहीं
बाद में अपना माथा रगडोगे

अर्जियां बहुत है लगाने को यारों
हलफनामे में मगर गैरहाज़िर रहोगे

तुम्हे तो मुस्कुराने से परहेज़ है
दूसरों की ख़ुशी कैसे समझोगे

अदालतों से ख़ारिज है मुकदमा तुम्हारा
ताज़िन्दगी अब तुम गुनहगार रहोगे

बेतरतीब सा माहौल बना रखा है
मसरूफ रहना कैसे सीखोगे

कभी माना होता इंसान उन्हें भी
तो गर्दन नीची तुम क्यों करोगे

अज़ानों से मज़हबी उन्माद फैलाया
कश्मीर को खून से फिर तुम रंगोगे

खुल रहे है दस्तावेज तो चिढ रहे हो
भाई को चारा बनाकर क्या खाते रहोगे

मस्जिदों से दहशती नारा लगाकर
पंडितों के ज़ख्मों पर ज़हर को मलोगे

अलख जो जल रही मशाल बन जाएगी
उसकी भभकती ज्वाला में जल मरोगे

सच तो अब आते रहेंगे जान लो तुम
क़यामत के बाद भी मरते रहोगे

तुम समझे मक़ाम ज़िन्दगी का
अरे छोड़ो यार कैसे समझोगे

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सांझी बात एक विमर्श बूटी है जीवन के विभिन्न आयामों और परिस्थितियों की। अवलोकन कीजिए, मंथन कीजिए और रस लीजिए वृहत्तर अनुभवों का अपने आस पास।

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