मिरे तकिये मे कई रातें बिखरती हैं

मिरे तकिये मे कई रातें बिखरती हैं
लब ग़ुलाम हैं और शिकायतें सुलगती है

पूरे चाकचौबंद से हिफ़ाज़त का मुआईना किया
पर एक सुराख से ही तो दीवारें उखड़ती है

यूँ बेसाख्ता बिछड़ा मुझसे मेरे मन का मीत
उसकी तलाश मे रोज़ नयी रहगुज़र बदलती है

ये चाँद, स्याह रात का चश्मदीद बन गया
रोशनी फिर अधपकी सी आसमान से गिरती है

खंजर मीठा चुभोकर मरहम ज़हर का दे दिया
यहाँ इसी तरह दोस्ती की सौगात मिलती है

दास्तान वो पल दो पल की है जिसे रहनुमाई कहते हैं
बाद मे वो जल्लादों के ज़मीर पर फुदकती है

कौन है जो है एक दूसरे की अकीदत करता है
यहाँ पर तो इज़्ज़त भरे बाज़ार मे उछलती है

तेरे ईमान की खुशबू बड़ी ही ज़हीन थी
अब तो वो गुंड़ों के मुहल्ले मे उड़ती है

भीड़ की रोशनाई में एक शख़्स तन्हा है
ज़िंदगी से मौत तक बसे ऐसे ही गुज़रती है

मैं कौन से काफिले मे शामिल होने जाऊं
ना ज़िंदा मे शामिल हूँ ,ना मौत मे गिनती है

ख़ौफ़ ये है, कहीं धोखेबाज़ी का लबादा ना हट जाये
इसीलिए अपनी ज़हनीयत सच से मुकरती है

मुझे अपने बेहोश होने के ज़रा सा भी इल्म नहीं
समझ तब आता है जब लानतें मिलती है

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सांझी बात एक विमर्श बूटी है जीवन के विभिन्न आयामों और परिस्थितियों की। अवलोकन कीजिए, मंथन कीजिए और रस लीजिए वृहत्तर अनुभवों का अपने आस पास।

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