मैं निर्मोही हो चला हूँ

मैं निर्मोही हो चला हूँ
जीवन की समस्त यातनाओं का वृतांत सुनाने,
मैं अपनी भाव भंगिमा को संभाले,
नयनों से नीर का बहाव रोकने चल पड़ा हूँ
मैं निर्मोही हो चला हूँ।

असंख्य सर्पदंश, अनगिनत पीड़ाओं का संताप लिए,
हृदय में प्रस्तर और शिलाओं को घर बनाकर, दूर निकल पड़ा हूँ
मैं निर्मोही हो चला हूँ।

निसंदेह प्रयासरत था कुछ नवीन उपलब्धियों को पाने हेतु,
खेद है कि नकारात्मक आलोचनाओं के
तीरों ने हृदय को छलनी कर दिया,
सबसे विमुख होकर सत्य को परखने चला हूँ
मैं निर्मोही हो चला हूँ।

एक व्यक्ति का मान दूसरे के लिए ईर्ष्या की सामग्री है,
धागे बिखर चुके हैं और टूटी हुई चखरी है
इसी से जुडी हुई आकाँक्षाओं की पतंग तोड़ रहा हूँ
मैं निर्मोही हो चला हूँ।

चिंतन से अधिक चिंता का सम्बल माथे पर चढ़ाते हैं
असफल व्यक्ति यहाँ जीवन के निर्देश सिखाते हैं
उन सभी की धारणाओं को पीछे छोड़ चला हूँ
मैं निर्मोही हो चला हूँ।

मन तो मूढ़ता के उत्कर्ष पर है
और स्वभाव अहंकार की शृंखलाओं में
प्रसन्नता की खोज करते विलासी तृष्णाओं में
भौतिकता के भौंडेपन को अक्षरश: ढो रहा हूँ
मैं निर्मोही हो चला हूँ।

अधिनायकवादी सीमाओं का सृजन मन के अंदर है
दोष दूसरे के माथे मढ़ना निरा आडम्बर है
स्वाधीनता के जड़ें शिथिल हो चुकी है
विचारों को दासता से मुक्त कर रहा हूँ
मैं निर्मोही हो चला हूँ।

स्वार्थ के असीम बंधन, शत्रुओं को साष्टांग अभिनन्दन
अमित्र समूह पर स्नेह की धारा और शुभचिंतकों का मान मर्दन
इन विषैली व्याख्याओं का अंत करने चला हूँ
मैं निर्मोही हो चला हूँ।

निर्मम और हृदय विदारक निर्णय क्षमता का विकास
आत्मघाती संप्रेषणों की स्वाभाविक प्रक्रिया का विन्यास
मन के अंतर से निर्वासित विचारों का अवसान
और विकृत क्रियाकलापों पर रोष का आधार
इसी धारणा को अपने व्यक्तित्व में समेट रहा हूँ
मैं निर्मोही हो चला हूँ।

यथार्थ की परिभाषा अब बदल चुकी है
अशालीन भाषाएँ परिलक्षित हो रही है
कल्पनाएं भी निरंकुशता बोने लगी है
इन कलात्मक हत्यांओँ का विरोध कर रहा हूँ
मैं निर्मोही हो चला हूँ ।

अब श्वासों पर भी कर लगाने का प्रावधान होगा
व्यक्ति अपनी निर्लज्जता से कब सावधान होगा
ये समय का ‘प्रतिबिम्ब’ है कि संवादहीनता पसरी हुई है
समालोचना की अवधारणा मरणसन्न पड़ी है
स्वयं को इन कटु सत्यों से अवगत करने चला हूँ
मैं निर्मोही हो चला हूँ।

ये तंत्र विकृत नहीं मानसिकता ही भ्रष्ट है
आदमी किसी से नहीं, स्वयं से त्रस्त है
एक का स्वाभिमान दूसरे का अपमान हो चला है
सभ्यता के पगडंडियों पर मानव गल रहा है
इन असभ्य मानकों पर मैं भी मिल रहा हूँ
मैं निर्मोही हो चला हूँ।

दर्पण का कार्य आभासी सत्य का अवलोकन नहीं
और ये संभावित भय से संभलने का भी प्रलोभन नहीं
ये वर्तमान के परिदृश्य में आवश्यकता का नितांत है
यदि नहीं हुआ तो सत्य का निश्चित ही प्राणांत है
मैं अपने मलिन ह्रदय को निर्मल कर रहा हूँ
मैं निर्मोही हो चला हूँ।

लालसाएं अतृप्त हैं और विपदाएं तृषित हैं
स्वछंदता के पवन भी यहाँ पर वर्जित हैं
रात्रि कोष से नवविहान की चेतना खोज रहा हूँ
मैं निर्मोही हो चला हूँ।

नारीवाद की ड्योढ़ी को सर पर लेकर दौड़े
छद्म जीवनशैली को शःक्तिकरण से जोड़े
पूर्वाग्रह उचित नहीं इतना ज्ञान है मगर
वर्जनाओं से उन्मुक्त होकर तृष्णाओं को भोगे
इसीमे लचर आधुनिकता को देख रहा हूँ
मैं निर्मोही हो चला हूँ।

पुरुषत्व अपने दम्भ से स्त्रीत्व का दमन करे
असमर्थ और अक्षम्य कुकर्म से शील भंजन करे
किन्नर स्वाभिमान ऐसे पौरुष से बेहतर है
जो अपने अज्ञानता से स्त्री का हरण करे
इनके कुकृत्य पर लेखनी तोड़ रहा हूँ
मैं निर्मोही हो चला हूँ।

About the Author

admin

सांझी बात एक विमर्श बूटी है जीवन के विभिन्न आयामों और परिस्थितियों की। अवलोकन कीजिए, मंथन कीजिए और रस लीजिए वृहत्तर अनुभवों का अपने आस पास।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may also like these