अस्तित्व

Existence

वो कभी कभी लगता है
बहुत दूर रहता है
और उसके होने का अहसास
है जैसे किसी ने त्वचा
पर गर्म चिमटा या
बर्फ़ की सिल्ली रख दी हो,

अरे! बर्फ़ की सिल्ली को तो फिर भी
झेला जा सकता है, मगर
गर्म चिमटा तो पूरे शरीर
की परत को ही ख़राब कर
देगा,

मैं जब भी सांस लेता हूँ तो
नाप कर नहीं लेता, शायद
आँख बंद करके कभी-कभी
ऐसा हो जाए तो ज्ञात नहीं,

ये अस्तित्व एक ऐसी डोर है जो
आत्मा के बिल्कुल सामने पाँव
से बंधी है,

यह अस्तित्व एक आसमान की
भांति सभी तारों, चाँद और खगोलीय
पिण्डों को अपने अंदर समेटना चाहता है।

पंचतत्वों से बने इस शरीर में
अनुभवों और कल्पनाओं ने
अपनी गहरी जगह बनाई है
और ये सब ऐसे लगता
जैसे बिल्कुल आंखों की
पुतलियों के दो इंच पास
रखे हों,

अस्तित्व अपने होने का
अहसास तब करवाता है
जब लोगों के शोर में भी
तुम्हारी आवाज़ दबती नहीं
बल्कि खिलकर उभरती है

उसकी ताक़त का अंदाज़ा इस
बात से है कि शरीर के बाद
भी यादों के सहारे और
कर्मों के लेखे-जोखे में वो
ज़िन्दा रहता है, जिसको कहते
हैं अस्तित्व

~ राजेश बलूनी ‘प्रतिबिम्ब’

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सांझी बात एक विमर्श बूटी है जीवन के विभिन्न आयामों और परिस्थितियों की। अवलोकन कीजिए, मंथन कीजिए और रस लीजिए वृहत्तर अनुभवों का अपने आस पास।

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