घर की दीवारें अब पुरानी
हो चली हैं, शायद उनमें
थोड़े छेद हो चुके हैं
कीट पतंगे और बहुत
से सूक्ष्म प्राणी जो नंगी
आंखों से भी नहीं दिखते,
उन छेदों को अपना घर
बनाना चाहते हैं
कितनी अजीब बात है न
मेरे घर की दीवारों के
छेद में भी किसी का
घर होगा।
पिछले साल की हुई सफ़ेदी
झड़ रही है, फ़र्श भी दरक
गया है और काला पड़ चुका है,
जब तक लोग घर में रहेंगे तब
तक वो घर रहेगा, इसके बाद
वो बंजर पत्थरों के ढेर के
सिवा कुछ नहीं है।
मेरा मन भी मेरे घर की तरह
मुझसे कभी-कभी अहसास
दिलाता है कि मेरे अंदर भी एक घर बसता है जिस पर मेरा कोई भी नियंत्रण नहीं क्योंकि कहने को तो मेरे मन का घर मेरा है लेकिन वहां रहने के लिए मुझे भी बेचैनी, प्रमाद, सुस्ती, और अवसाद रूपी किराया देना पड़ता है, और ये मन भी
कूड़ाघर की तरह बन जाता है जब
ये कमजोरियों और तृष्णाओं
के जीवन का आनंद ढूंढता है।
मैं पहले अपनी यात्रा
अकेला ही करना चाहता
था मगर जब इसमें
‘हम’ का प्रवेश हुआ
तो हर कदम पर इच्छाओं
में परिवर्तन करना
पड़ा, पता नहीं
‘मैं’ से ‘हम’ तक के
सफ़र में स्वतंत्रता
कहीं न कहीं पीछे
छूट जाती है,
और हो सकता है
कि मैं ही अति
प्रतिक्रिया कर
रहा हूँ और ‘हम’
बनकर वो मिले जो
शायद ‘मैं’ बनकर
न मिलता हो
मगर एक बात
मैं जानता हूँ कि
‘मैं’ का होना
बहुत जरूरी है
‘हम’ बनने के लिए
~ राजेश बलूनी ‘प्रतिबिम्ब’