कहो कबूतर संदेशों को
कैसे तुम पहुंचाओगे
ऊँची बिल्डिंग ऊँचा छप्पर
कैसे उड़ ही पाओगे
इंसानों ने घर न बनाया
जैसे किलों का गढ़ है बनाया
साँसें दब जाती है अंदर
घुटन का हिस्सा बाहर आया
धुआं तो जीवन का हिस्सा है
कोई कहे ये क्या किस्सा है
पेड़ों ने हैं तने गवाए
जड़ को भी वह छोड़ न पाए
इन्सां को कहां समझ ये आए
जब बादल फटता, धरती हिलती
बाढ़ की हालत जीवन छीनती
तब जाकर तू होश में आया
अब क्या करना सब तो गंवाया
पिघल रहे हैं बर्फ शिखर पर
सूख रहे हैं सात समंदर
बीज से निकला पौधा कहता
अच्छा होता जन्म न लेता
एक दिन पेड़ तो बनना है
किसी एक दिन कटना है
कोई बताए कहाँ से आए
जो बच जाए नज़र न आए
पंछी भी उड़ने में जैसे
आलस के पंखों के जैसे
कौए, बाज़, चील और चिड़िया
देखो गायब इनकी दुनिया
केवल झुण्ड कबूतर है
इसी का लगता चक्कर है
फिर—
कहो कबूतर संदेशों को
कैसे तुम पहुंचाओगे
~ राजेश बलूनी ‘प्रतिबिम्ब’