बिखरे पन्ने… भाग -2
दुनिया से लड़ता हूँ लेकिन, खुद के दिल को कैसे मनाऊं बेगानी रूखी रातों में,
दुनिया से लड़ता हूँ लेकिन, खुद के दिल को कैसे मनाऊं बेगानी रूखी रातों में,
जब आप संकल्प लेते हैं तो आप आधी जीत तभी पूरी कर लेते हैं और
प्यार में तेरे गजब हो गया मैं सिर्फ तेरी निगाहों में खो गया मुझसे न
प्यार की हद नहीं है, तुम इतना समझ लो कि मैंने दिल से किया और
कद्र कोई करता नहीं इन गजलों की यारों सब खिल्ली उड़ाने का जरिया समझते हैं
दिल करता है खोजबीन कि कुछ मिल जाए सुकून न सही मंजिल ही मिल जाए
जुगनू हूं रात में गश्त लगाता हूं अपनी हैसियत के हिसाब से जगमगाता हूं मेरी
मैं झूठे आरोपों और बरगलाने के लिए आता हूँ मैं खानदानी डकैतों को किसान बताता
पेट की तड़प मिटाने को मैं घर से निकल आया लेकिन इस शहर का पानी
अपने हुनर और मेहनत की बदौलत सब कुछ पाउँगा एक दिन अपने इरादों में ज़रूर