जुस्तजू
मुझे नहीं तो मेरे एहसास को तवज्जो दे तुझे देखा है मैंने रोज़ खवाबों में
मुश्किलों से भरी राहों को पार करके दृढ संकल्प की सीमा को तैयार करके गतिशील
ये राहें अंजान नहीं है यूँ ही मै इसमें नजर बंद करके चलना चाहता हूँ
बदले है घर के परिवेश बढ़ रहे हर जगह है क्लेश हो रहा है क्यों
चल उस जगह जहाँ सपनो को आकार मिले यूँ घुटे हुए अरमानो को आवाज़ मिले
गौर भी करें तो किस किस पर करें सब यहां मगन हैं अपने ही हाल
सूखे हुए उजाले अब अँधेरे हो गए दीवारों पर रेंगती हुई ज़िंदगी की खातिर कुछ