लापरवाह
मैंने तो सिर्फ तुझे जीने की हिदायतें दी थी मेरा डांटना तेरे लिए कोई ज़हर
संभलना जरा उस से नजरें बचाकर कहीं बेवकूफ ना बना दे खूबसूरती दिखा कर आंखों
खाक बड़ा था ये समंदर भी एक बूंद भी तिश्नगी इस से नहीं बुझी बढ़ाए
सांसें उखड़ रही रही हैं जिंदगी उजड़ रही हैं ना पैसे का रूवाब है ना
सांसे उखड़ रही है वक्त से पहले उम्र भी पहले ही खत्म हो रही है
वो ठिठुरता हुआ कूड़ा बीनता है सर्दी में उसे पता है कि भूख सर्दी से
कौन से शहर का तू बाशिंदा है मेरे घर में तो आजकल दंगा है बस
यूं किसकी फिराक में रहता है दिल रूह से रूबरू होता तो बाहर नहीं भटकता