उसे सामने देखकर लफ़्ज़ रुक गए
उसे सामने देखकर लफ़्ज़ रुक गए ख्वाबों में तो कितना बतियाते थे कभी गौर नहीं
उसे सामने देखकर लफ़्ज़ रुक गए ख्वाबों में तो कितना बतियाते थे कभी गौर नहीं
होती है खामोशी जब खता अपनी हो इल्ज़ाम दूसरों पर हो तो हंगामा होता है
संभलना जरा उस से नजरें बचाकर कहीं बेवकूफ ना बना दे खूबसूरती दिखा कर आंखों
खाक बड़ा था ये समंदर भी एक बूंद भी तिश्नगी इस से नहीं बुझी बढ़ाए
सांसें उखड़ रही रही हैं जिंदगी उजड़ रही हैं ना पैसे का रूवाब है ना
सांसे उखड़ रही है वक्त से पहले उम्र भी पहले ही खत्म हो रही है
वो ठिठुरता हुआ कूड़ा बीनता है सर्दी में उसे पता है कि भूख सर्दी से
कौन से शहर का तू बाशिंदा है मेरे घर में तो आजकल दंगा है बस
यूं किसकी फिराक में रहता है दिल रूह से रूबरू होता तो बाहर नहीं भटकता