उम्मीद की लौ एक नया दीया जलाती है
कभी कुछ सोंचूं तो याद बह जाती है मेरे सिरहाने में आने से नींद कतराती
कभी कुछ सोंचूं तो याद बह जाती है मेरे सिरहाने में आने से नींद कतराती
ये धूप चटक होती है यूं सर्द गरम होती है अब शाम की फुहारों में
Lockdown में सभी व्यक्तियों को घर मे रहना है और कोरोना महामारी को भारत से
बिखरा – बिखरा सब हिल गया है टुकड़ा टुकड़ा मेरा दिल हुआ है सपनो के
कुछ अधपकी उम्मीदों को हथेली में रखकर आया है इस गली में कोई इतने दिनों
मेरी आवाज दरिया में खो सी गई है अँधेरे में रोशनी भी सो सी गई
बहुत दिनों बाद मिला अपनी कविता से, उससे वार्तालाप हुई तत्पश्चात उसको मन के सूक्ष्म
यह बात पूर्णतः सत्य है कि वास्तविक भारत गाँव में बसता है। मगर जिस तरह