ग्रामीण जीवन , साहित्य सुन रहे हो तुम? December 5, 2021 सुन रहे हो तुम? उन सूखी पत्तियों की सरसराहट जो बसंती बयार का इंतज़ार करते हुए ज़मीन पर बिखरी पड़ी
साहित्य रब ने दिया है सबको बराबर मौका December 4, 2021 रब ने दिया है सबको बराबर मौका वो इंसान पर है कि कैसे ज़िन्दगी सँवारे एक चिड़िया दाना चुगती है
ग्रामीण जीवन , विचार लॉकडाउन में है नौकरी पर खतरा? गाँव लौटिये और सबसे कम पूँजी का सफल बिजनेस कीजिये November 18, 2021 जिस व्यक्ति के अंदर दृढ़ इच्छा शक्ति पैदा हो जाती है वह कठिन से कठिन कार्य बड़ी आसानी से कर
साहित्य उसे सामने देखकर लफ़्ज़ रुक गए October 30, 2021 उसे सामने देखकर लफ़्ज़ रुक गए ख्वाबों में तो कितना बतियाते थे कभी गौर नहीं किया अपने तेवरों पर बात
साहित्य होती है खामोशी जब खता अपनी हो August 15, 2021 होती है खामोशी जब खता अपनी हो इल्ज़ाम दूसरों पर हो तो हंगामा होता है उसके ज़हन से ये बात
साहित्य लापरवाह July 24, 2021 मैंने तो सिर्फ तुझे जीने की हिदायतें दी थी मेरा डांटना तेरे लिए कोई ज़हर नहीं है मिट्टी की सौंधी
साहित्य संभलना जरा उस से नजरें बचाकर July 11, 2021 संभलना जरा उस से नजरें बचाकर कहीं बेवकूफ ना बना दे खूबसूरती दिखा कर आंखों ने बहुत धोखे दिए हैं
यात्रा वर्णन , विचार अनिश्चित… July 10, 2021 ये क्या प्रतिकूल परिस्थितियां है मेरे जीवन में, कहीं भी स्वतंत्रता का भान नहीं, बस जीवन व्यतीत हो रहा एक
साहित्य खाक बड़ा था ये समंदर भी June 20, 2021 खाक बड़ा था ये समंदर भी एक बूंद भी तिश्नगी इस से नहीं बुझी बढ़ाए थे अपने कदम कि रास्ते
साहित्य सांसें उखड़ रही है… भाग -2 May 27, 2021 सांसें उखड़ रही रही हैं जिंदगी उजड़ रही हैं ना पैसे का रूवाब है ना वक्त की बिसात है ये