कहानी , ग्रामीण जीवन , विचार बचपन का दुर्गापूजा September 2, 2022 प्रत्येक व्यक्ति जब वो अपने बचपन को जी रहा होता है उस के लिए उमंग-उत्साह का त्यौहार है दुर्गापूजा। प्रातः
साहित्य ये सांस का मुकद्दर भी कहां तक रहेगा June 26, 2022 ये सांस का मुकद्दर भी कहां तक रहेगा वहीं, जहां धड़कनों का सैलाब बहेगा उनको कहां किस बात की कमी
साहित्य जिंदगी पेचीदा है, शहर बज़्म से सजा है May 28, 2022 जिंदगी पेचीदा है, शहर बज़्म से सजा है मेरे रुआब में कोई गर्द सा सटा है गैर जरूरी शिकवे यहां
साहित्य दिलों में इरादों की मशाल लेकर चलता हूं May 3, 2022 कभी अपनी धुन में कभी बेपरवाह रहता हूं मैं परिंदों सा उड़ने का हौसला रखता हूं मुझे यकीन है कि
साहित्य दिलासा क्या दूँ दिल को April 17, 2022 दिलासा क्या दूँ दिल को, ये भटक रहा है किसी और की सरपरस्ती में उछल रहा है जानता हूँ मैं
साहित्य शरीर थक गया, वहम का आगोश है April 3, 2022 शरीर थक गया, वहम का आगोश है और लोग कहते हैं जिंदगी में जोश है चीख कर दुनिया ने मेरा
साहित्य धड़कने बयां करती है ज़िन्दगी की किश्तें March 27, 2022 धड़कने बयां करती है ज़िन्दगी की किश्तें सांसों का गुच्छा अब टूट रहा है आगजनी होती है सोच में सभी
साहित्य खुल रहे है दस्तावेज तो चिढ रहे हो March 26, 2022 सांप से ही दोस्ती पाली थी हमने चांवल की बोरी में धंसकर मरोगे जिरह क्या करना जब सुनवाई नहीं है
साहित्य रोज़ देखता हूँ आसपास तो March 23, 2022 रोज़ देखता हूँ आसपास तो सवालों से भरे चेहरे परेशां करते हैं वही बेचैनी, वही नाकामयाबी और वही फितूर इतने
साहित्य आख़िर March 20, 2022 मैं क्यों इस क़दर प्यार करूं मैं क्यों इस क़दर तुझपे मरूं देना तुझे अगर गम ही है तो, मैं