दिलासा क्या दूँ दिल को
दिलासा क्या दूँ दिल को, ये भटक रहा है किसी और की सरपरस्ती में उछल
दिलासा क्या दूँ दिल को, ये भटक रहा है किसी और की सरपरस्ती में उछल
शरीर थक गया, वहम का आगोश है और लोग कहते हैं जिंदगी में जोश है
धड़कने बयां करती है ज़िन्दगी की किश्तें सांसों का गुच्छा अब टूट रहा है आगजनी
सांप से ही दोस्ती पाली थी हमने चांवल की बोरी में धंसकर मरोगे जिरह क्या
रोज़ देखता हूँ आसपास तो सवालों से भरे चेहरे परेशां करते हैं वही बेचैनी, वही
मेरा नूर जब भी मुझसे नाराज़ होता है, हमेशा मैं उसे मनाऊं यही सोचता है,
होश खो रहे हैं हम उनको कुछ फ़िक्र नहीं है क्या प्यार है ये, या
जिनके कदमों ने हिम्मत की है बढ़ने की फिर मंजिलों के निशान मिल ही जाते
दुनिया से लड़ता हूँ लेकिन, खुद के दिल को कैसे मनाऊं बेगानी रूखी रातों में,